अध्याय 6 · 22 / 42
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प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥
प्रशान्त—श्रीकृष्ण के चरणकमलों में स्थिर मन; मनसम्—जिसका मन इस प्रकार स्थिर है उसका; हि—निश्चय ही; एनम्—इस; योगिनम्—योगी को; सुखम्—सुख; उत्तमम्—सर्वोच्च; उपैति—प्राप्त होता है; शान्त-रजसम्—शान्त किया गया रजोगुण; ब्रह्म-भूतम्—परब्रह्म से तादात्म्य द्वारा मुक्त; अकल्मषम्—समस्त पूर्व पापमय प्रतिक्रिया से मुक्त।
जिस योगी का मन मुझ पर स्थिर है, वह निश्चय ही सर्वोच्च सुख प्राप्त करता है। ब्रह्म के साथ अपने तादात्म्य के कारण वह मुक्त हो जाता है; उसका मन शान्त होता है, उसका रजोगुण शान्त हो जाता है, और वह पाप से मुक्त हो जाता है।
ब्रह्म-भूत भौतिक संदूषण से मुक्त होकर भगवान् की दिव्य सेवा में स्थित होने की अवस्था है। मद्-भक्तिं लभते पराम् (गीता 18.54)। जब तक मनुष्य का मन भगवान् के चरणकमलों में स्थिर न हो, तब तक वह परब्रह्म अर्थात् परम सत्य की ब्रह्म-स्थिति में नहीं रह सकता। स वै मनः कृष्ण-पदारविन्दयोः। भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में सदैव संलग्न रहना अथवा कृष्णभावनामृत में स्थित रहना ही वस्तुतः रजोगुण और समस्त भौतिक संदूषण से मुक्त होना है।