अध्याय 6 · 27 / 42
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आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥
आत्म—स्वयं; औपम्येन—तुलना द्वारा; सर्वत्र—सर्वत्र; समम्—समता; पश्यति—देखता है; यः—जो; अर्जुन—हे अर्जुन; सुखम्—सुख; वा—अथवा; यदि—यदि; वा—अथवा; दुःखम्—दुःख; सः—ऐसा; योगी—योगी; परमः—पूर्ण; मतः—माना जाता है।
हे अर्जुन! वही पूर्ण योगी है, जो अपने साथ तुलना करके समस्त प्राणियों की वास्तविक समता को उनके सुख तथा दुःख दोनों में देखता है।
जो कृष्णभावनाभावित है, वही पूर्ण योगी है; वह अपने व्यक्तिगत अनुभव के बल पर सबके सुख तथा दुःख से अवगत रहता है। जीव के दुःख का कारण भगवान् के साथ उसके सम्बन्ध की विस्मृति है। और सुख का कारण श्रीकृष्ण को मनुष्य के समस्त कार्यकलापों का परम भोक्ता जानना है। श्रीकृष्ण समस्त भूमियों तथा लोकों के स्वामी हैं। पूर्ण योगी समस्त जीवों का सबसे निष्कपट मित्र होता है। वह जानता है कि भौतिक प्रकृति के गुणों से बद्ध जीव, श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध की विस्मृति के कारण, त्रिविध भौतिक दुःखों के अधीन होता है। चूँकि कृष्णभावनामृत में स्थित मनुष्य सुखी रहता है, अतः वह सर्वत्र श्रीकृष्ण के ज्ञान का वितरण करने का प्रयास करता है। चूँकि पूर्ण योगी कृष्णभावनाभावित बनने के महत्त्व का प्रचार करने का प्रयत्न करता है, इसलिए वह संसार का सर्वश्रेष्ठ परोपकारी है, और वह भगवान् का सर्वाधिक प्रिय सेवक है। न तस्मात् कश्चिद् मे प्रियकृत् तमः। दूसरे शब्दों में, भगवान् का भक्त सदा समस्त जीवों के कल्याण की ओर दृष्टि रखता है, और इस प्रकार वह वस्तुतः सबका मित्र है। वह सर्वश्रेष्ठ योगी है, क्योंकि वह योग में सिद्धि की कामना अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं करता, अपितु दूसरों के लिए भी प्रयत्न करता है। वह अपने सहवर्ती जीवों से ईर्ष्या नहीं करता। यहाँ भगवान् के शुद्ध भक्त तथा केवल अपने व्यक्तिगत उत्थान में रुचि रखने वाले योगी के बीच विरोध दर्शाया गया है। जो योगी पूर्ण रूप से ध्यान करने के लिए किसी एकान्त स्थान में चला गया है, वह सम्भवतः उस भक्त के समान पूर्ण नहीं है, जो प्रत्येक मनुष्य को कृष्णभावनामृत की ओर मोड़ने का भरसक प्रयास कर रहा है।