हि

अध्याय 6 · 28 / 42

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अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३ ॥

अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; यः—प्रणाली; अयम्—यह; योगः—योग; त्वया—आपके द्वारा; प्रोक्तः—वर्णित; साम्येन—सामान्यतः; मधुसूदन—हे मधु असुर के संहारक; एतस्य—इसका; अहम्—मैं; न—नहीं; पश्यामि—देखता हूँ; चञ्चलत्वात्—चञ्चल होने के कारण; स्थितिम्—स्थिति; स्थिराम्—स्थिर।

अर्जुन ने कहा : हे मधुसूदन! जिस योग-प्रणाली का आपने सार रूप में वर्णन किया है, वह मुझे अव्यावहारिक तथा असह्य प्रतीत होती है, क्योंकि मन चञ्चल तथा अस्थिर है।

भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को बताई गई योग-प्रणाली का, जो शुचौ देशे शब्दों से आरम्भ होकर योगी परमः पर समाप्त होती है, यहाँ अर्जुन अपनी असमर्थता की भावना से अस्वीकार कर रहे हैं। इस कलियुग में किसी सामान्य मनुष्य के लिए घर छोड़कर पर्वतों या वनों के किसी एकान्त स्थान में जाकर योग का अभ्यास करना सम्भव नहीं है। वर्तमान युग अल्पायु जीवन के लिए कटु संघर्ष से चिह्नित है। लोग सरल तथा व्यावहारिक उपायों से भी आत्म-साक्षात्कार के विषय में गम्भीर नहीं हैं, फिर इस कठिन योग-प्रणाली की तो बात ही क्या, जो जीवन-शैली, बैठने की रीति, स्थान के चयन तथा भौतिक प्रवृत्तियों से मन की अनासक्ति का नियमन करती है। एक व्यावहारिक मनुष्य के रूप में अर्जुन ने सोचा कि इस योग-प्रणाली का पालन करना असम्भव है, यद्यपि वे अनेक प्रकार से अनुकूल रूप से सम्पन्न थे। वे राजपरिवार के थे तथा असंख्य गुणों की दृष्टि से अत्यन्त उन्नत थे; वे महान् योद्धा थे, उनकी आयु दीर्घ थी, और सबसे बढ़कर, वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के सर्वाधिक घनिष्ठ मित्र थे। पाँच हज़ार वर्ष पूर्व अर्जुन के पास हमसे कहीं अधिक उत्तम सुविधाएँ थीं, फिर भी उन्होंने इस योग-प्रणाली को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। वस्तुतः इतिहास में हमें ऐसा कोई अभिलेख नहीं मिलता कि उन्होंने किसी भी समय इसका अभ्यास किया हो। अतः इस प्रणाली को इस कलियुग में सामान्यतः असम्भव माना जाना चाहिए। निःसन्देह यह कुछ अत्यन्त विरल मनुष्यों के लिए सम्भव हो सकता है, किन्तु सामान्य जनता के लिए यह एक असम्भव प्रस्ताव है। यदि पाँच हज़ार वर्ष पूर्व ऐसा था, तो आज की क्या बात? जो लोग विभिन्न तथाकथित विद्यालयों तथा समाजों में इस योग-प्रणाली का अनुकरण कर रहे हैं, वे यद्यपि आत्मसन्तुष्ट हैं, किन्तु निश्चय ही अपना समय नष्ट कर रहे हैं। वे अभीष्ट लक्ष्य से पूर्णतः अनभिज्ञ हैं।