अध्याय 6 · 5 / 42
6.5
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥
उद्धरेत्—मनुष्य को उद्धार करना चाहिए; आत्मना—मन के द्वारा; आत्मानम्—बद्ध आत्मा का; न—कभी नहीं; आत्मानम्—बद्ध आत्मा को; अवसादयेत्—अधोगति में डाले; आत्मा—मन; एव—निश्चय ही; हि—वस्तुतः; आत्मनः—बद्ध आत्मा का; बन्धुः—मित्र; आत्मा—मन; एव—निश्चय ही; रिपुः—शत्रु; आत्मनः—बद्ध आत्मा का।
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मन के द्वारा अपना उद्धार करे, न कि अपनी अधोगति। मन ही बद्ध आत्मा का मित्र है, और वही उसका शत्रु भी है।
आत्मा शब्द भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के अनुसार शरीर, मन तथा आत्मा का बोधक है। योग पद्धति में मन तथा बद्ध आत्मा विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। चूँकि योगाभ्यास का केन्द्र-बिन्दु मन है, अतः यहाँ आत्मा का तात्पर्य मन से है। योग पद्धति का प्रयोजन मन को वश में करना तथा उसे विषयों की आसक्ति से दूर खींचना है। यहाँ इस बात पर बल दिया गया है कि मन को इस प्रकार प्रशिक्षित करना चाहिए कि वह बद्ध आत्मा को अज्ञान के पंक से उबार सके। भौतिक अस्तित्व में मनुष्य मन तथा इन्द्रियों के प्रभाव के अधीन रहता है। वस्तुतः शुद्ध आत्मा भौतिक जगत् में इसीलिए फँसी हुई है क्योंकि मन का अहंकार भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाना चाहता है। अतः मन को इस प्रकार प्रशिक्षित करना चाहिए कि वह भौतिक प्रकृति की चमक-दमक से आकृष्ट न हो, और इस प्रकार बद्ध आत्मा की रक्षा हो सके। मनुष्य को विषयों के प्रति आकर्षण से अपनी अधोगति नहीं करनी चाहिए। मनुष्य जितना अधिक विषयों से आकृष्ट होता है, उतना ही अधिक वह भौतिक अस्तित्व में फँसता जाता है। अपने को छुड़ाने का सर्वोत्तम उपाय यही है कि मन को सदा कृष्णभावनामृत में संलग्न रखा जाए। यहाँ हि शब्द का प्रयोग इसी बात पर बल देने के लिए हुआ है, अर्थात् मनुष्य को ऐसा करना ही चाहिए। यह भी कहा गया है :
mana eva manuṣyāṇāṁ kāraṇaṁ bandha-mokṣayoḥ
bandhāya viṣayāsaṅgo muktyai nirviṣayaṁ manaḥ.
“मनुष्यों के लिए मन ही बन्धन का कारण है और मन ही मुक्ति का कारण है। विषयों में लीन मन बन्धन का कारण है, और विषयों से विरक्त मन मुक्ति का कारण है।” अतएव जो मन सदा कृष्णभावनामृत में संलग्न रहता है, वही परम मुक्ति का कारण है।