हि

अध्याय 6 · 4 / 42

6.4

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥

यदा—जब; हि—निश्चय ही; न—नहीं; इन्द्रिय-अर्थेषु—इन्द्रियतृप्ति में; न—कभी नहीं; कर्मसु—सकाम क्रियाओं में; अनुषज्जते—अनिवार्यतः संलग्न होता है; सर्व-सङ्कल्प—समस्त भौतिक इच्छाएँ; सन्न्यासी—त्यागी; योग-आरूढः—योग में उन्नत; तदा—उस समय; उच्यते—कहा जाता है।

जब मनुष्य समस्त भौतिक इच्छाओं का त्याग करके न तो इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करता है और न ही सकाम क्रियाओं में प्रवृत्त होता है, तब उसे योगारूढ कहा जाता है।

जब मनुष्य भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में पूर्णतः संलग्न रहता है, तब वह अपने में ही प्रसन्न रहता है, और इस प्रकार वह न तो इन्द्रियतृप्ति में प्रवृत्त रहता है और न ही सकाम क्रियाओं में। अन्यथा मनुष्य को इन्द्रियतृप्ति में प्रवृत्त रहना ही पड़ता है, क्योंकि वह किसी न किसी प्रवृत्ति के बिना जीवित नहीं रह सकता। कृष्णभावनामृत के बिना मनुष्य को सदा आत्मकेन्द्रित अथवा विस्तृत स्वार्थपूर्ण क्रियाओं की खोज में रहना पड़ता है। किन्तु कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सब कुछ श्रीकृष्ण की तृप्ति के लिए कर सकता है और इस प्रकार इन्द्रियतृप्ति से पूर्णतया विरक्त रह सकता है। जिसे ऐसी अनुभूति नहीं है, उसे योगरूपी सीढ़ी के सर्वोच्च सोपान पर आरूढ होने से पूर्व भौतिक इच्छाओं से यान्त्रिक रूप से बचने का प्रयत्न करना पड़ता है।