अध्याय 6 · 7 / 42
6.7
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७ ॥
जित-आत्मनः—जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसका; प्रशान्तस्य—जिसने मन पर ऐसे संयम से शान्ति प्राप्त कर ली है, उसका; परमात्मा—परमात्मा; समाहितः—पूर्णतः प्राप्त; शीत—शीत; उष्ण—उष्णता; सुख—सुख में; दुःखेषु—दुःख में; तथा—भी; मान—मान; अपमानयोः—अपमान में।
जिसने मन को जीत लिया है, उसके लिए परमात्मा पहले से ही प्राप्त हैं, क्योंकि उसने शान्ति प्राप्त कर ली है। ऐसे मनुष्य के लिए सुख तथा दुःख, शीत तथा उष्णता, मान तथा अपमान—सब समान हैं।
वस्तुतः प्रत्येक जीव का यह प्रयोजन है कि वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदेश का पालन करे, जो परमात्मा के रूप में प्रत्येक के हृदय में विराजमान हैं। जब मन बाह्य माया-शक्ति द्वारा भटका दिया जाता है, तब मनुष्य भौतिक क्रियाओं में फँस जाता है। अतः ज्यों ही किसी योग पद्धति के द्वारा मनुष्य का मन वश में हो जाता है, त्यों ही उसे लक्ष्य पर पहुँचा हुआ मान लेना चाहिए। मनुष्य को उच्चतर आदेश का पालन करना ही होता है। जब मनुष्य का मन उच्चतर प्रकृति पर स्थिर हो जाता है, तब उसके पास परम के आदेश का पालन करने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं रहता। मन को किसी न किसी उच्चतर आदेश को स्वीकार करके उसका पालन करना ही पड़ता है। मन को वश में करने का परिणाम यह होता है कि मनुष्य स्वतः ही परमात्मा के आदेश का पालन करने लगता है। चूँकि कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति यह दिव्य स्थिति तत्काल प्राप्त कर लेता है, अतः भगवान् का भक्त भौतिक अस्तित्व के द्वन्द्वों—अर्थात् दुःख तथा सुख, शीत तथा उष्णता आदि—से अप्रभावित रहता है। यह दशा व्यावहारिक समाधि, अर्थात् परम में तल्लीनता है।