हि

अध्याय 6 · 8 / 42

6.8

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ट्राश्मकाञ्चनः ॥ ८ ॥

ज्ञान—अर्जित ज्ञान; विज्ञान—अनुभूत ज्ञान; तृप्त—सन्तुष्ट; आत्मा—जीव; कूटस्थः—आध्यात्मिक रूप से स्थित; विजित-इन्द्रियः—जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं; युक्तः—आत्म-साक्षात्कार में सक्षम; इति—इस प्रकार; उच्यते—कहा जाता है; योगी—योगी; सम—समभाव; लोष्ट्र—कंकड़; अश्म—पत्थर; काञ्चनः—स्वर्ण।

जब मनुष्य अर्जित ज्ञान तथा अनुभूति के बल पर पूर्णतः सन्तुष्ट हो जाता है, तब उसे आत्म-साक्षात्कार में स्थित कहा जाता है और वह योगी [अथवा योगसिद्ध] कहलाता है। ऐसा व्यक्ति दिव्यता में स्थित होता है और आत्मसंयमी होता है। वह सब कुछ को—चाहे वह कंकड़ हो, पत्थर हो अथवा स्वर्ण—समान दृष्टि से देखता है।

परम सत्य की अनुभूति के बिना शास्त्रीय ज्ञान निरर्थक है। इसे इस प्रकार कहा गया है :

ataḥ śrī-kṛṣṇa-nāmādi na bhaved grāhyam indriyaiḥ

sevonmukhe hi jihvādau svayam eva sphuraty adaḥ.

“कोई भी अपनी भौतिक रूप से दूषित इन्द्रियों के द्वारा श्रीकृष्ण के नाम, रूप, गुण तथा लीलाओं की दिव्य प्रकृति को नहीं समझ सकता। केवल जब मनुष्य भगवान् की दिव्य सेवा से आध्यात्मिक रूप से अनुप्राणित हो जाता है, तभी भगवान् के दिव्य नाम, रूप, गुण तथा लीलाएँ उस पर प्रकट होते हैं।” (पद्म पुराण)

यह भगवद्गीता कृष्णभावनामृत का विज्ञान है। कोई भी केवल सांसारिक पाण्डित्य से कृष्णभावनाभावित नहीं बन सकता। मनुष्य को इतना सौभाग्यशाली होना चाहिए कि वह किसी शुद्ध चेतना में स्थित व्यक्ति की संगति प्राप्त करे। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को श्रीकृष्ण की कृपा से अनुभूत ज्ञान प्राप्त होता है, क्योंकि वह शुद्ध भक्ति से सन्तुष्ट रहता है। अनुभूत ज्ञान के द्वारा मनुष्य पूर्ण बनता है। दिव्य ज्ञान के द्वारा मनुष्य अपने विश्वासों में दृढ़ रह सकता है, किन्तु केवल अकादमिक ज्ञान के द्वारा मनुष्य आभासी विरोधाभासों से सहज ही भ्रमित तथा विमोहित हो सकता है। वही अनुभूत आत्मा वास्तव में आत्मसंयमी है, क्योंकि वह श्रीकृष्ण के शरणागत है। वह दिव्य है, क्योंकि सांसारिक पाण्डित्य से उसका कोई सरोकार नहीं है। उसके लिए सांसारिक पाण्डित्य तथा मानसिक कल्पना, जो दूसरों के लिए स्वर्ण के समान मूल्यवान हो सकती है, कंकड़ अथवा पत्थर से अधिक मूल्य की नहीं है।