हि

अध्याय 7 · 1 / 30

7.1

श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥

श्री भगवान् उवाच—श्रीभगवान् ने कहा; मयि—मुझमें; आसक्त-मनाः—मन से आसक्त; पार्थ—हे पृथापुत्र; योगम्—आत्म-साक्षात्कार; युञ्जन्—इस प्रकार अभ्यास करते हुए; मत्-आश्रयः—मेरी भावना में (कृष्णभावनामृत में); असंशयम्—सन्देहरहित रूप से; समग्रम्—पूर्ण रूप से; माम्—मुझे; यथा—जितना; ज्ञास्यसि—तुम जान सकते हो; तत्—वह; शृणु—सुनने का प्रयत्न करो।

हे पृथापुत्र [अर्जुन], अब सुनो कि मुझमें आसक्त मन से, मेरी पूर्ण भावना में योग का अभ्यास करते हुए, तुम मुझे सन्देहरहित होकर पूर्ण रूप से किस प्रकार जान सकते हो।

भगवद्गीता के इस सातवें अध्याय में कृष्णभावनामृत के स्वरूप का पूर्ण वर्णन हुआ है। श्रीकृष्ण समस्त ऐश्वर्यों से परिपूर्ण हैं, और वे ऐसे ऐश्वर्यों को किस प्रकार प्रकट करते हैं, इसका वर्णन यहाँ किया गया है। साथ ही, चार प्रकार के भाग्यशाली व्यक्ति जो श्रीकृष्ण के प्रति आसक्त होते हैं, तथा चार प्रकार के अभागे व्यक्ति जो कभी श्रीकृष्ण की शरण नहीं लेते, उनका भी वर्णन इस अध्याय में किया गया है।

भगवद्गीता के प्रथम छह अध्यायों में जीव को अभौतिक आत्मा के रूप में वर्णित किया गया है, जो विभिन्न प्रकार के योगों द्वारा स्वयं को आत्म-साक्षात्कार तक उन्नत करने में समर्थ है। छठे अध्याय के अन्त में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि श्रीकृष्ण पर मन की स्थिर एकाग्रता, अथवा दूसरे शब्दों में कृष्णभावनामृत, समस्त योगों का सर्वोच्च रूप है। अपने मन को श्रीकृष्ण पर एकाग्र करके ही मनुष्य परम सत्य को पूर्ण रूप से जान सकता है, अन्यथा नहीं। निराकार ब्रह्मज्योति अथवा स्थानिक परमात्मा की अनुभूति परम सत्य का पूर्ण ज्ञान नहीं है, क्योंकि वह आंशिक है। पूर्ण एवं वैज्ञानिक ज्ञान श्रीकृष्ण ही हैं, और कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति पर सब कुछ प्रकट हो जाता है। पूर्ण कृष्णभावनामृत में मनुष्य यह जान लेता है कि श्रीकृष्ण ही समस्त सन्देहों से परे परम ज्ञान हैं। विभिन्न प्रकार के योग कृष्णभावनामृत के पथ पर मात्र सोपान हैं। जो सीधे कृष्णभावनामृत को ग्रहण करता है, वह स्वतः ही ब्रह्मज्योति तथा परमात्मा को पूर्ण रूप से जान लेता है। कृष्णभावनामृत-योग के अभ्यास से मनुष्य सब कुछ पूर्ण रूप से जान सकता है—अर्थात् परम सत्य, जीव, भौतिक प्रकृति, तथा अपने साधन-सामग्री सहित उनके प्रकटीकरण।

अतः मनुष्य को छठे अध्याय के अन्तिम श्लोक में दिए गए निर्देशानुसार योग का अभ्यास आरम्भ करना चाहिए। परमेश्वर श्रीकृष्ण पर मन की एकाग्रता नौ विभिन्न रूपों वाली विहित भक्ति से सम्भव होती है, जिनमें श्रवणम् प्रथम तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए भगवान् अर्जुन से कहते हैं, “तत् शृणु”, अर्थात् “मुझसे सुनो”। श्रीकृष्ण से बड़ा कोई अधिकारी नहीं हो सकता, और इसीलिए उनसे सुनकर मनुष्य को कृष्णभावनामृत में प्रगति का सर्वश्रेष्ठ अवसर प्राप्त होता है। अतः मनुष्य को साक्षात् श्रीकृष्ण से अथवा श्रीकृष्ण के किसी शुद्ध भक्त से सीखना चाहिए—न कि अकादमिक शिक्षा से दर्पयुक्त किसी अभक्त उद्धत व्यक्ति से।

श्रीमद्भागवत में परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को समझने की इस प्रक्रिया का वर्णन प्रथम स्कन्ध के द्वितीय अध्याय में इस प्रकार किया गया है:

śṛṇvatāṁ sva-kathāṁ kṛṣṇaḥ puṇya-śravaṇa-kīrtanaḥ

hṛdyantaḥstho hy abhadrāṇi vidbunoti suhṛt satām.

naṣṭa-prāyeṣv abhadreṣu nityaṁ bhāgavata-sevayā

bhagavaty uttama-śloke bhaktir bhavati naiṣṭhikī.

tadā rajas-tamo-bhāvāḥ kāma-lobhadayaś ca ye

ceta etair anāviddhaṁ sthitaṁ sattve prasīdati.

evam prasanna-manaso bhagavad-bhakti-yogataḥ

bhagavat-tattva-vijñānaṁ mukta-saṅgasya jāyate.

bhidyate hṛdaya-granthiś chidyante sarva-saṁśayāḥ

kṣīyante cāsya karmāṇi dṛṣṭa evātmanīśvare.

“वैदिक साहित्य से श्रीकृष्ण के विषय में सुनना, अथवा भगवद्गीता के माध्यम से साक्षात् उन्हीं से सुनना, स्वयं में धर्ममय कर्म है। और जो श्रीकृष्ण के विषय में सुनता है, उसके लिए सबके हृदय में निवास करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण परम हितैषी मित्र के रूप में कार्य करते हैं और उस भक्त को पवित्र करते हैं जो निरन्तर उनका श्रवण करता है। इस प्रकार भक्त में उसका सुप्त दिव्य ज्ञान स्वाभाविक रूप से विकसित होता है। ज्यों-ज्यों वह भागवत से तथा भक्तगण से श्रीकृष्ण के विषय में अधिक सुनता है, त्यों-त्यों वह भगवान् की भक्ति में स्थिर हो जाता है। भक्ति के विकास से मनुष्य रजोगुण तथा तमोगुण से मुक्त हो जाता है, और इस प्रकार भौतिक काम तथा लोभ क्षीण हो जाते हैं। जब ये कल्मष धुल जाते हैं, तब साधक शुद्ध सत्त्व की अपनी स्थिति में स्थिर रहता है, भक्ति से उल्लसित होता है और ईश्वर के विज्ञान को पूर्ण रूप से समझ लेता है। इस प्रकार भक्तियोग भौतिक स्नेह की कठोर ग्रन्थि को काट देता है और मनुष्य को तत्काल ‘असंशयं समग्रम्’—परम सत्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के बोध—की अवस्था तक पहुँचा देता है।” (भा. 1.2.17-21)

अतः केवल श्रीकृष्ण से अथवा कृष्णभावनामृत में स्थित उनके भक्त से सुनकर ही मनुष्य श्रीकृष्ण के विज्ञान को समझ सकता है।