अध्याय 7 · 2 / 30
7.2
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥
ज्ञानम्—लौकिक ज्ञान; ते—तुम्हें; अहम्—मैं; स—सहित; विज्ञानम्—पारलौकिक ज्ञान; इदम्—यह; वक्ष्यामि—बताऊँगा; अशेषतः—पूर्ण रूप से; यत्—जिसे; ज्ञात्वा—जानकर; न—नहीं; इह—इस संसार में; भूयः—और आगे; अन्यत्—और कुछ भी; ज्ञातव्यम्—जानने योग्य; अवशिष्यते—शेष रहता है।
अब मैं तुम्हें यह ज्ञान—लौकिक तथा पारलौकिक दोनों—पूर्ण रूप से बताऊँगा, जिसे जान लेने पर जानने योग्य और कुछ शेष नहीं रहेगा।
पूर्ण ज्ञान में लौकिक जगत् का ज्ञान तथा उसके पीछे स्थित आत्मा का ज्ञान सम्मिलित है। इन दोनों का स्रोत दिव्य ज्ञान है। भगवान् उपर्युक्त ज्ञान-प्रणाली को समझाना चाहते हैं, क्योंकि अर्जुन श्रीकृष्ण का अन्तरंग भक्त एवं मित्र है। चौथे अध्याय के आरम्भ में यह व्याख्या भगवान् द्वारा दी गई थी, और यहाँ इसकी पुनः पुष्टि होती है: पूर्ण ज्ञान केवल भगवान् का भक्त ही गुरु-परम्परा में साक्षात् भगवान् से प्राप्त कर सकता है। अतएव मनुष्य को इतना बुद्धिमान् होना चाहिए कि वह समस्त ज्ञान के स्रोत को जान सके, जो समस्त कारणों के कारण हैं तथा सभी प्रकार के योगाभ्यासों में ध्यान के एकमात्र विषय हैं। जब समस्त कारणों का कारण ज्ञात हो जाता है, तब प्रत्येक जानने योग्य वस्तु ज्ञात हो जाती है, और कुछ भी अज्ञात नहीं रहता। वेद कहते हैं, “यस्मिन् विज्ञाते सर्वम् एव विज्ञातं भवन्ति।”