अध्याय 7 · 10 / 30
7.10
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥
बीजम्—बीज; माम्—मुझे; सर्व-भूतानाम्—समस्त जीवों का; विद्धि—समझने का प्रयत्न करो; पार्थ—हे पृथापुत्र; सनातनम्—मूल, नित्य; बुद्धिः—बुद्धि; बुद्धिमताम्—बुद्धिमानों की; अस्मि—मैं हूँ; तेजः—पराक्रम; तेजस्विनाम्—पराक्रमियों का; अहम्—मैं हूँ।
हे पृथापुत्र, जान लो कि मैं समस्त अस्तित्वों का मूल बीज हूँ, बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ, तथा समस्त पराक्रमी मनुष्यों का पराक्रम हूँ।
बीजम् का अर्थ है बीज; श्रीकृष्ण प्रत्येक वस्तु के बीज हैं। भौतिक प्रकृति के सम्पर्क में आकर वह बीज विभिन्न जीवों—जंगम तथा स्थावर—के रूप में फलित होता है। पक्षी, पशु, मनुष्य तथा अन्य अनेक जीवित प्राणी जंगम जीव हैं; किन्तु वृक्ष तथा पौधे स्थावर हैं—वे चल नहीं सकते, केवल खड़े रहते हैं। प्रत्येक जीव चौरासी लाख योनियों के परिक्षेत्र के भीतर समाहित है; इनमें से कुछ जंगम हैं और कुछ स्थावर। किन्तु सभी अवस्थाओं में उनके जीवन का बीज श्रीकृष्ण ही हैं। जैसा कि वैदिक साहित्य में कहा गया है, ब्रह्म अथवा परम सत्य वह है जिससे प्रत्येक वस्तु निकल रही है। श्रीकृष्ण परब्रह्म, परम आत्मा हैं। ब्रह्म निराकार है और परब्रह्म साकार है। निराकार ब्रह्म साकार पक्ष में स्थित है—यह भगवद्गीता में कहा गया है। अतएव, मूलतः, श्रीकृष्ण ही प्रत्येक वस्तु के स्रोत हैं। वे मूल हैं। जिस प्रकार किसी वृक्ष की जड़ समूचे वृक्ष का पोषण करती है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण, समस्त वस्तुओं की मूल जड़ होने के कारण, इस भौतिक प्रकटीकरण में प्रत्येक वस्तु का पोषण करते हैं। इसकी पुष्टि वैदिक साहित्य में भी होती है। यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। “परम सत्य वह है जिससे प्रत्येक वस्तु उत्पन्न होती है।” वे समस्त नित्यों में आदि नित्य हैं। वे समस्त जीवों के परम जीव हैं, और वे ही अकेले समस्त जीवन का पोषण कर रहे हैं। श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि वे समस्त बुद्धि के मूल हैं। जब तक मनुष्य बुद्धिमान् न हो, तब तक वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को नहीं समझ सकता।