अध्याय 7 · 11 / 30
7.11
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥
बलम्—बल; बलवताम्—बलवानों का; च—तथा; अहम्—मैं हूँ; काम—काम; राग—आसक्ति; विवर्जितम्—रहित; धर्म-अविरुद्ध—धर्म के विरुद्ध नहीं; भूतेषु—समस्त प्राणियों में; कामः—यौन-जीवन; अस्मि—मैं हूँ; भरतर्षभ—हे भरतश्रेष्ठ।
मैं बलवानों का वह बल हूँ जो काम तथा आसक्ति से रहित है। हे भरतश्रेष्ठ [अर्जुन], मैं वह यौन-जीवन हूँ जो धर्म के विरुद्ध नहीं है।
बलवान् मनुष्य का बल दुर्बलों की रक्षा हेतु प्रयुक्त होना चाहिए, व्यक्तिगत आक्रमण हेतु नहीं। इसी प्रकार, यौन-जीवन धर्म (धर्म) के अनुसार सन्तानोत्पत्ति हेतु होना चाहिए, अन्यथा नहीं। तब माता-पिता का उत्तरदायित्व यह है कि वे अपनी सन्तान को कृष्णभावनाभावित बनाएँ।