अध्याय 7 · 12 / 30
7.12
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२ ॥
ये—वे सब; च—तथा; एव—निश्चय ही; सात्त्विकाः—सत्त्व में; भावाः—अस्तित्व की अवस्थाएँ; राजसाः—रजोगुण; तामसाः—तमोगुण; च—भी; ये—यद्यपि; मत्तः—मुझसे; एव—निश्चय ही; इति—इस प्रकार; तान्—उन्हें; विद्धि—जानने का प्रयत्न करो; न—नहीं; तु—किन्तु; अहम्—मैं; तेषु—उनमें; ते—वे; मयि—मुझमें।
अस्तित्व की समस्त अवस्थाएँ—चाहे वे सत्त्व, रज अथवा तम की हों—मेरी शक्ति से प्रकट होती हैं। एक अर्थ में मैं ही सब कुछ हूँ—किन्तु मैं स्वतन्त्र हूँ। मैं इस भौतिक प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं हूँ।
जगत् की समस्त भौतिक क्रियाएँ प्रकृति के तीन गुणों के अधीन संचालित हो रही हैं। यद्यपि प्रकृति के ये भौतिक गुण परमेश्वर श्रीकृष्ण से उद्भूत हैं, तथापि वे उनके अधीन नहीं हैं। उदाहरणार्थ, राज्य के नियमों के अधीन किसी को दण्ड दिया जा सकता है, किन्तु राजा, जो नियम-निर्माता है, उस नियम के अधीन नहीं होता। इसी प्रकार, प्रकृति के समस्त गुण—सत्त्व, रज तथा तम—परमेश्वर श्रीकृष्ण से उद्भूत हैं, किन्तु श्रीकृष्ण भौतिक प्रकृति के अधीन नहीं हैं। अतएव वे निर्गुण हैं, जिसका अर्थ है कि ये गुण, यद्यपि उन्हीं से निकलते हैं, उन्हें प्रभावित नहीं करते। यह भगवान् अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की विशेष विशेषताओं में से एक है।