हि

अध्याय 7 · 13 / 30

7.13

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३ ॥

त्रिभिः—तीन; गुणमयैः—तीन गुणों द्वारा; भावैः—अस्तित्व की अवस्था; एभिः—इन सबसे; सर्वम्—समूचा संसार; इदम्—इस संसार में; जगत्—ब्रह्माण्ड; मोहितम्—मोहित; न अभिजानाति—नहीं जानते; माम्—मुझे; एभ्यः—इनसे ऊपर; परम्—परम; अव्ययम्—अक्षय।

तीन गुणों [सत्त्व, रज तथा तम] से मोहित होकर समूचा संसार मुझे नहीं जानता, जो इन गुणों से ऊपर तथा अक्षय हूँ।

समूचा संसार प्रकृति के तीन गुणों से मोहित है। जो इन तीन गुणों से व्यामोहित हैं, वे यह नहीं समझ पाते कि इस भौतिक प्रकृति से परे परमेश्वर श्रीकृष्ण हैं। इस भौतिक जगत् में प्रत्येक व्यक्ति इन तीन गुणों के प्रभाव में है और इस प्रकार व्यामोहित है।

स्वभाव से जीवों के विशेष प्रकार के शरीर तथा तदनुसार विशेष प्रकार की मानसिक एवं जैविक क्रियाएँ होती हैं। प्रकृति के तीन भौतिक गुणों में कार्य करने वाले मनुष्यों के चार वर्ग हैं। जो विशुद्ध रूप से सत्त्वगुण में हैं, वे ब्राह्मण कहलाते हैं। जो विशुद्ध रूप से रजोगुण में हैं, वे क्षत्रिय कहलाते हैं। जो रज तथा तम दोनों गुणों में हैं, वे वैश्य कहलाते हैं। जो पूर्ण रूप से तमोगुण में हैं, वे शूद्र कहलाते हैं। और जो इससे भी निम्न हैं, वे पशु अथवा पशु-जीवन हैं। किन्तु ये पदनाम स्थायी नहीं हैं। मैं चाहे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा जो कुछ भी होऊँ—किसी भी स्थिति में, यह जीवन अस्थायी है। किन्तु यद्यपि जीवन अस्थायी है और हम नहीं जानते कि अगले जीवन में हम क्या होंगे, फिर भी, इस मायामयी शक्ति के प्रभाव से, हम स्वयं को इस देहात्म-बुद्धि के प्रकाश में देखते हैं, और इस प्रकार हम सोचते हैं कि हम अमेरिकी, भारतीय, रूसी अथवा ब्राह्मण, हिन्दू, मुसलमान इत्यादि हैं। और यदि हम प्रकृति के गुणों में उलझ जाते हैं, तो हम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को भूल जाते हैं जो इन समस्त गुणों के पीछे हैं। अतः भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि प्रकृति के इन तीन गुणों से मोहित मनुष्य यह नहीं समझते कि भौतिक पृष्ठभूमि के पीछे परम भगवान् हैं।

अनेक विभिन्न प्रकार के जीव हैं—मनुष्य, देवता, पशु इत्यादि—और इनमें से प्रत्येक भौतिक प्रकृति के प्रभाव में है, और इन सभी ने दिव्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को भुला दिया है। जो रज तथा तम के गुणों में हैं, और यहाँ तक कि जो सत्त्वगुण में हैं, वे भी परम सत्य की निराकार ब्रह्म-धारणा से आगे नहीं बढ़ सकते। वे परमेश्वर के साकार पक्ष के समक्ष व्यामोहित हो जाते हैं, जो समस्त सौन्दर्य, ऐश्वर्य, ज्ञान, बल, यश तथा वैराग्य से युक्त है। जब सत्त्वगुण में स्थित व्यक्ति भी नहीं समझ पाते, तो रज तथा तम में स्थित व्यक्तियों के लिए क्या आशा है? कृष्णभावनामृत भौतिक प्रकृति के इन समस्त तीनों गुणों से परे है, और जो वास्तव में कृष्णभावनामृत में स्थित हैं, वे वास्तव में मुक्त हैं।