हि

अध्याय 7 · 19 / 30

7.19

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ १९ ॥

bahūnām—अनेक; janmanām—जन्मों; ante—के पश्चात्; jñānavān—ज्ञानवान वह; mām—मेरी; prapadyate—शरण लेता है; vāsudevaḥ—समस्त कारणों का कारण; sarvam—सब कुछ; iti—इस प्रकार; saḥ—ऐसी; mahātmā—महान् आत्मा; sudurlabhaḥ—अत्यन्त दुर्लभ।

अनेक जन्म-मृत्यु के पश्चात्, जो वस्तुतः ज्ञान में है, वह मुझे समस्त कारणों का कारण तथा जो कुछ है उस सबका कारण जानकर मेरी शरण लेता है। ऐसी महान् आत्मा अत्यन्त दुर्लभ है।

जीव, अनेकानेक जन्मों के पश्चात् भक्ति अथवा दिव्य अनुष्ठानों का निष्पादन करते हुए, वस्तुतः उस दिव्य शुद्ध ज्ञान में स्थित हो सकता है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ही आध्यात्मिक अनुभूति का परम लक्ष्य हैं। आध्यात्मिक अनुभूति के आरम्भ में, जब मनुष्य भौतिकता के प्रति अपनी आसक्ति का त्याग करने का प्रयत्न कर रहा होता है, तब निराकारवाद की ओर कुछ झुकाव रहता है, किन्तु जब मनुष्य और अधिक उन्नत होता है तो वह समझ सकता है कि आध्यात्मिक जीवन में क्रियाएँ हैं और ये क्रियाएँ भक्ति का निर्माण करती हैं। इसका अनुभव करके वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति आसक्त हो जाता है और उनकी शरण लेता है। ऐसे समय में मनुष्य समझ सकता है कि भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा ही सर्वस्व है, कि वे ही समस्त कारणों का कारण हैं और यह भौतिक प्रकटीकरण उनसे स्वतन्त्र नहीं है। वह भौतिक जगत् को आध्यात्मिक वैविध्य का विकृत प्रतिबिम्ब अनुभव करता है और अनुभव करता है कि प्रत्येक वस्तु में परम भगवान् श्रीकृष्ण के साथ एक सम्बन्ध है। इस प्रकार वह प्रत्येक वस्तु को वासुदेव अर्थात् श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में सोचता है। वासुदेव की ऐसी सार्वभौम दृष्टि मनुष्य की परम भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति परम लक्ष्य के रूप में पूर्ण शरणागति को प्रेरित करती है। ऐसी शरणागत महान् आत्माएँ अत्यन्त दुर्लभ हैं।

इस श्लोक की अत्यन्त सुन्दर व्याख्या श्वेताश्वतर उपनिषद् के तीसरे अध्याय में की गई है: “इस शरीर में बोलने, देखने, सुनने, मानसिक क्रियाओं आदि की शक्तियाँ हैं। किन्तु यदि ये परम भगवान् से सम्बन्धित न हों तो ये महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। और चूँकि वासुदेव सर्वव्यापी हैं और सब कुछ वासुदेव है, अतः भक्त पूर्ण ज्ञान में शरण लेता है।” (तुलना करें भगवद्गीता 7.17 तथा 11.40)