अध्याय 7 · 20 / 30
7.20
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ २० ॥
kamaiḥ—इच्छाओं द्वारा; taiḥ—उन; taiḥ—उन; hṛta—विकृत; jñānāḥ—ज्ञान; prapadyante—शरण लेते हैं; anya—अन्य; devatāḥ—देवता; tam—उस; tam—उस; niyamam—नियम; āsthāya—अनुसरण करते हुए; prakṛtyā—प्रकृति द्वारा; niyatāḥ—नियन्त्रित; svayā—अपनी ही।
जिनके मन भौतिक इच्छाओं से विकृत हो गए हैं, वे देवताओं की शरण लेते हैं और अपने-अपने स्वभाव के अनुसार पूजा के विशिष्ट नियमों और विधानों का पालन करते हैं।
जो समस्त भौतिक कल्मषों से मुक्त हैं, वे परमेश्वर की शरण लेते हैं और उनकी भक्ति में संलग्न होते हैं। जब तक भौतिक कल्मष पूर्णतः धुल नहीं जाता, तब तक वे स्वभाव से अभक्त हैं। किन्तु जिनकी भौतिक इच्छाएँ हैं और जो परमेश्वर की शरण लेते हैं, वे भी बाह्य प्रकृति की ओर इतने अधिक आकृष्ट नहीं होते; सही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने के कारण वे शीघ्र ही समस्त भौतिक काम-वासना से मुक्त हो जाते हैं। श्रीमद्भागवत में अनुशंसा की गई है कि मनुष्य चाहे समस्त भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो, अथवा भौतिक इच्छाओं से पूर्ण हो, अथवा भौतिक कल्मष से मुक्ति की इच्छा करता हो, अथवा शुद्ध भक्त हो और भौतिक इन्द्रियतृप्ति की कोई इच्छा न रखता हो, उसे सभी स्थितियों में वासुदेव की शरण लेनी चाहिए और उनकी आराधना करनी चाहिए।
भागवत में कहा गया है कि अल्प बुद्धि वाले लोग, जिन्होंने अपना आध्यात्मिक बोध खो दिया है, भौतिक इच्छाओं की तत्काल पूर्ति के लिए देवताओं की शरण लेते हैं। सामान्यतः ऐसे लोग पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के पास नहीं जाते, क्योंकि वे प्रकृति के विशेष गुणों (तमोगुण तथा रजोगुण) में होते हैं और इसलिए विभिन्न देवताओं की पूजा करते हैं। पूजा के नियमों और विधानों का पालन करते हुए वे सन्तुष्ट रहते हैं। देवताओं के उपासक छोटी-छोटी इच्छाओं से प्रेरित होते हैं और नहीं जानते कि परम लक्ष्य तक कैसे पहुँचा जाए, किन्तु परमेश्वर का भक्त कुमार्ग पर नहीं जाता। चूँकि वैदिक साहित्य में भिन्न-भिन्न प्रयोजनों के लिए भिन्न-भिन्न देवताओं की पूजा की अनुशंसाएँ हैं (जैसे, रोगी मनुष्य को सूर्य की पूजा की अनुशंसा की जाती है), इसलिए जो भगवान् के भक्त नहीं हैं, वे सोचते हैं कि कुछ प्रयोजनों के लिए देवता परमेश्वर से श्रेष्ठ हैं। किन्तु शुद्ध भक्त जानता है कि परम भगवान् श्रीकृष्ण ही सबके स्वामी हैं। चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है कि केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण ही स्वामी हैं और अन्य सभी सेवक हैं। अतएव शुद्ध भक्त अपनी भौतिक आवश्यकताओं की तृप्ति के लिए कभी देवताओं के पास नहीं जाता। वह परमेश्वर पर निर्भर रहता है। और शुद्ध भक्त वही जो भगवान् देते हैं, उसी से सन्तुष्ट रहता है।