हि

अध्याय 7 · 21 / 30

7.21

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥

yaḥ—जो; yaḥ—जो; yām—जिस; yām—जिस; tanum—देवताओं का रूप; bhaktaḥ—भक्त; śraddhayā—श्रद्धा सहित; arcitum—पूजा करने; icchati—इच्छा करता है; tasya—उसकी; tasya—उसकी; acalām—दृढ़; śraddhām—श्रद्धा; tam—उसे; eva—निश्चय ही; vidadhāmi—देता हूँ; aham—मैं।

मैं परमात्मा के रूप में प्रत्येक के हृदय में स्थित हूँ। जैसे ही कोई देवताओं की पूजा करने की इच्छा करता है, मैं उसकी श्रद्धा को दृढ़ कर देता हूँ ताकि वह स्वयं को किसी विशेष देवता के प्रति समर्पित कर सके।

ईश्वर ने प्रत्येक को स्वतन्त्रता दी है; अतएव यदि कोई व्यक्ति भौतिक भोग की इच्छा करता है और भौतिक देवताओं से ऐसी सुविधाएँ प्राप्त करना अत्यन्त निष्ठापूर्वक चाहता है, तो परमेश्वर, प्रत्येक के हृदय में परमात्मा रूप में, यह समझते हैं और ऐसे व्यक्तियों को सुविधाएँ प्रदान करते हैं। समस्त जीवों के परम पिता के रूप में वे उनकी स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप नहीं करते, अपितु समस्त सुविधाएँ देते हैं ताकि वे अपनी भौतिक इच्छाओं को पूर्ण कर सकें। कुछ लोग पूछ सकते हैं कि सर्वशक्तिमान ईश्वर जीवों को इस भौतिक जगत् का भोग करने की सुविधाएँ क्यों देते हैं और इस प्रकार उन्हें मायामय ऊर्जा के जाल में क्यों गिरने देते हैं। उत्तर यह है कि यदि परमेश्वर परमात्मा रूप में ऐसी सुविधाएँ न दें, तो स्वतन्त्रता का कोई अर्थ ही नहीं रहता। अतएव वे प्रत्येक को पूर्ण स्वतन्त्रता देते हैं—जो कुछ कोई चाहे—किन्तु उनका परम उपदेश हमें भगवद्गीता में मिलता है: मनुष्य को अन्य समस्त कार्यों को त्यागकर पूर्णतः उनकी शरण लेनी चाहिए। यही मनुष्य को सुखी बनाएगा।

जीव तथा देवता दोनों पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की इच्छा के अधीन हैं; अतएव जीव अपनी इच्छा से देवता की पूजा नहीं कर सकता, न ही देवता परम इच्छा के बिना कोई वरदान प्रदान कर सकता है। जैसा कहा गया है, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की इच्छा के बिना घास का एक तिनका भी नहीं हिलता। सामान्यतः जो लोग भौतिक जगत् में आर्त होते हैं, वे देवताओं के पास जाते हैं, जैसा वैदिक साहित्य में उन्हें परामर्श दिया जाता है। कोई विशेष वस्तु चाहने वाला व्यक्ति अमुक-अमुक देवता की पूजा कर सकता है। उदाहरणार्थ, रोगी व्यक्ति को सूर्यदेव की पूजा की अनुशंसा की जाती है; शिक्षा चाहने वाला व्यक्ति विद्या की देवी सरस्वती की पूजा कर सकता है; और सुन्दर पत्नी चाहने वाला व्यक्ति भगवान् शिव की पत्नी देवी उमा की पूजा कर सकता है। इस प्रकार शास्त्रों (वैदिक शास्त्रों) में भिन्न-भिन्न देवताओं की पूजा की भिन्न-भिन्न विधियों की अनुशंसाएँ हैं। और चूँकि कोई विशेष जीव किसी विशेष भौतिक सुविधा का भोग करना चाहता है, इसलिए भगवान् उसमें उस विशेष देवता से वह वरदान प्राप्त करने की प्रबल इच्छा भर देते हैं, और इस प्रकार वह सफलतापूर्वक वह वरदान प्राप्त करता है। किसी विशेष प्रकार के देवता के प्रति जीव की भक्ति-वृत्ति की विशेष विधि की व्यवस्था भी परमेश्वर ही करते हैं। देवता जीवों में ऐसा अनुराग नहीं भर सकते, किन्तु चूँकि वे परमेश्वर अथवा परमात्मा हैं जो समस्त जीवों के हृदय में विद्यमान हैं, अतः श्रीकृष्ण मनुष्य को कुछ देवताओं की पूजा करने की प्रेरणा देते हैं। देवता वस्तुतः परमेश्वर के विराट शरीर के भिन्न-भिन्न अंग हैं; अतएव उनकी कोई स्वतन्त्रता नहीं है। वैदिक साहित्य (तैत्तिरीय उपनिषद्, प्रथम अनुवाक) में कहा गया है: “पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् परमात्मा रूप में देवता के हृदय में भी विद्यमान हैं; अतएव वे देवता के माध्यम से जीव की इच्छा पूर्ण करने की व्यवस्था करते हैं। किन्तु देवता तथा जीव दोनों परम इच्छा पर निर्भर हैं। वे स्वतन्त्र नहीं हैं।”