अध्याय 7 · 22 / 30
7.22
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२ ॥
saḥ—वह; tayā—उस; śraddhayā—श्रद्धा सहित; yuktaḥ—युक्त; tasya—उसकी; ārādhanam—आराधना; īhate—खोजता है; labhate—प्राप्त करता है; ca—और; tataḥ—जिससे; kāmān—इच्छाएँ; mayā—मेरे द्वारा; eva—अकेले; vihitān—नियन्त्रित; hi—के लिए; tān—वे।
ऐसी श्रद्धा से युक्त होकर वह किसी विशेष देवता का अनुग्रह खोजता है और अपनी इच्छाओं को प्राप्त करता है। किन्तु वस्तुतः ये लाभ केवल मेरे द्वारा ही प्रदान किए जाते हैं।
देवता परमेश्वर की अनुमति के बिना भक्तों को वरदान प्रदान नहीं कर सकते। जीव भले ही भूल जाए कि प्रत्येक वस्तु परमेश्वर की सम्पत्ति है, किन्तु देवता नहीं भूलते। अतः देवताओं की पूजा तथा वांछित फलों की प्राप्ति देवताओं के कारण नहीं, अपितु व्यवस्था द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के कारण होती है। अल्प बुद्धि वाला जीव इसे नहीं जानता, और इसलिए वह मूर्खतावश किसी लाभ के लिए देवताओं के पास जाता है। किन्तु शुद्ध भक्त, जब उसे किसी वस्तु की आवश्यकता होती है, तो केवल परमेश्वर से ही प्रार्थना करता है। तथापि भौतिक लाभ माँगना शुद्ध भक्त का लक्षण नहीं है। जीव सामान्यतः देवताओं के पास इसलिए जाता है क्योंकि वह अपनी काम-वासना पूर्ण करने के लिए उन्मत्त है। यह तब होता है जब जीव कोई अनुचित वस्तु चाहता है, और भगवान् स्वयं वह इच्छा पूर्ण नहीं करते। चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है कि जो परमेश्वर की पूजा करता है और साथ ही भौतिक भोग की इच्छा करता है, वह अपनी इच्छाओं में विरोधाभासी है। परमेश्वर की भक्ति तथा देवता की पूजा एक ही स्तर पर नहीं हो सकती, क्योंकि देवता की पूजा भौतिक है और परमेश्वर की भक्ति पूर्णतः आध्यात्मिक है।
जो जीव भगवद्धाम लौटना चाहता है, उसके लिए भौतिक इच्छाएँ बाधाएँ हैं। अतएव भगवान् के शुद्ध भक्त को वे भौतिक लाभ नहीं दिए जाते, जिन्हें अल्प बुद्धि वाले जीव चाहते हैं, जो परमेश्वर की भक्ति में संलग्न होने के बजाय भौतिक जगत् के देवताओं की पूजा करना पसन्द करते हैं।