हि

अध्याय 7 · 23 / 30

7.23

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३ ॥

antavat tu—सीमित तथा क्षणिक; phalam—फल; teṣām—उनके; tat—वह; bhavati—होता है; alpa-medhasām—अल्प बुद्धि वालों के; devān—देवताओं के लोक; deva-yajaḥ—देवताओं के उपासक; yānti—प्राप्त करते हैं; mat—मेरे; bhaktāḥ—भक्त; yānti—प्राप्त करते हैं; mām—मुझे; api—निश्चय ही।

अल्प बुद्धि वाले मनुष्य देवताओं की पूजा करते हैं, और उनके फल सीमित तथा क्षणिक होते हैं। जो देवताओं की पूजा करते हैं, वे देवताओं के लोकों को जाते हैं, किन्तु मेरे भक्त अन्ततः मेरे परम लोक को प्राप्त करते हैं।

गीता के कुछ टीकाकार कहते हैं कि जो देवता की पूजा करता है, वह परमेश्वर तक पहुँच सकता है, किन्तु यहाँ स्पष्टतः कहा गया है कि देवताओं के उपासक उन भिन्न-भिन्न लोक-मण्डलों को जाते हैं जहाँ विभिन्न देवता स्थित हैं, ठीक जैसे सूर्य का उपासक सूर्य को प्राप्त करता है अथवा चन्द्रदेव का उपासक चन्द्रमा को प्राप्त करता है। इसी प्रकार, यदि कोई इन्द्र जैसे देवता की पूजा करना चाहता है, तो वह उस विशेष देवता के लोक को प्राप्त कर सकता है। ऐसा नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति, चाहे जिस किसी देवता की पूजा करे, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तक पहुँचेगा। इसका यहाँ खण्डन किया गया है, क्योंकि स्पष्टतः कहा गया है कि देवताओं के उपासक भौतिक जगत् के भिन्न-भिन्न लोकों को जाते हैं, किन्तु परमेश्वर का भक्त सीधे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के परम लोक को जाता है।

यहाँ यह तर्क उठाया जा सकता है कि यदि देवता परमेश्वर के शरीर के भिन्न-भिन्न अंग हैं, तो उनकी पूजा करने से भी वही लक्ष्य प्राप्त होना चाहिए। तथापि, देवताओं के उपासक अल्प बुद्धि वाले हैं, क्योंकि वे नहीं जानते कि शरीर के किस अंग को भोजन देना चाहिए। उनमें से कुछ इतने मूर्ख हैं कि वे दावा करते हैं कि भोजन देने के अनेक अंग और अनेक मार्ग हैं। यह बहुत आशाजनक नहीं है। क्या कोई कानों अथवा आँखों के माध्यम से शरीर को भोजन दे सकता है? वे नहीं जानते कि ये देवता परमेश्वर के विराट शरीर के भिन्न-भिन्न अंग हैं, और अपने अज्ञान में वे यह विश्वास करते हैं कि प्रत्येक देवता एक पृथक् ईश्वर तथा परमेश्वर का प्रतिद्वन्द्वी है।

केवल देवता ही नहीं, अपितु सामान्य जीव भी परमेश्वर के अंश हैं। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि ब्राह्मण परमेश्वर के सिर हैं, क्षत्रिय भुजाएँ हैं, इत्यादि, और सभी भिन्न-भिन्न कार्य करते हैं। स्थिति चाहे जो हो, यदि कोई यह जानता है कि देवता तथा वह स्वयं दोनों परमेश्वर के अंश हैं, तो उसका ज्ञान पूर्ण है। किन्तु यदि वह इसे नहीं समझता, तो वह भिन्न-भिन्न लोकों को प्राप्त करता है जहाँ देवता निवास करते हैं। यह वह गन्तव्य नहीं है जिसे भक्त प्राप्त करता है।

देवताओं के वरदानों से प्राप्त फल नश्वर हैं, क्योंकि इस भौतिक जगत् के भीतर लोक, देवता तथा उनके उपासक—सभी नश्वर हैं। अतएव इस श्लोक में स्पष्टतः कहा गया है कि देवताओं की पूजा से प्राप्त समस्त फल नश्वर हैं, और इसलिए ऐसी पूजा अल्प बुद्धि वाले जीव द्वारा की जाती है। चूँकि कृष्णभावनामृत में परमेश्वर की भक्ति में संलग्न शुद्ध भक्त ज्ञान से पूर्ण नित्य आनन्दमय अस्तित्व प्राप्त करता है, अतः उसकी उपलब्धियाँ तथा देवताओं के सामान्य उपासक की उपलब्धियाँ भिन्न हैं। परमेश्वर असीम हैं; उनका अनुग्रह असीम है; उनकी कृपा असीम है। अतएव परमेश्वर की अपने शुद्ध भक्तों पर कृपा असीम है।