हि

अध्याय 7 · 26 / 30

7.26

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६ ॥

veda—जानता हूँ; aham—मैं; sama—समान रूप से; atītāni—भूत; vartamānāni—वर्तमान; ca—और; arjuna—हे अर्जुन; bhaviṣyāṇi—भविष्य; ca—भी; bhūtāni—जीव; mām—मुझे; tu—किन्तु; veda—जानता है; na—नहीं; kaścana—कोई।

हे अर्जुन, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में मैं वह सब जानता हूँ जो भूत में घटित हुआ, वह सब जो वर्तमान में घटित हो रहा है, तथा वे समस्त वस्तुएँ जो अभी आने वाली हैं। मैं समस्त जीवों को भी जानता हूँ; किन्तु मुझे कोई नहीं जानता।

यहाँ साकारता तथा निराकारता का प्रश्न स्पष्टतः कहा गया है। यदि श्रीकृष्ण, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप, को निराकारवादी माया, अर्थात् भौतिक, मानें, तो वे, जीव के समान, अपना शरीर बदलते और अपने पूर्व जीवन की प्रत्येक वस्तु को भूल जाते। भौतिक शरीर वाला कोई भी व्यक्ति अपने पूर्व जीवन का स्मरण नहीं कर सकता, न ही वह अपने भावी जीवन की भविष्यवाणी कर सकता है, न ही वह अपने वर्तमान जीवन के परिणाम का पूर्वानुमान कर सकता है; अतएव वह नहीं जान सकता कि भूत, वर्तमान तथा भविष्य में क्या घटित हो रहा है। जब तक मनुष्य भौतिक कल्मष से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक वह भूत, वर्तमान तथा भविष्य को नहीं जान सकता।

सामान्य मनुष्य के विपरीत, भगवान् श्रीकृष्ण स्पष्टतः कहते हैं कि वे पूर्णतः जानते हैं कि भूत में क्या घटित हुआ, वर्तमान में क्या घटित हो रहा है, तथा भविष्य में क्या घटित होगा। चौथे अध्याय में हमने देखा है कि भगवान् श्रीकृष्ण को स्मरण है कि उन्होंने लाखों वर्ष पूर्व सूर्यदेव विवस्वान् को उपदेश दिया था। श्रीकृष्ण प्रत्येक जीव को जानते हैं, क्योंकि वे परमात्मा के रूप में प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं। किन्तु प्रत्येक जीव में परमात्मा के रूप में अपनी उपस्थिति तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में भौतिक आकाश से परे अपनी उपस्थिति के बावजूद, अल्प बुद्धि वाले उन्हें परम पुरुष के रूप में अनुभव नहीं कर सकते। निश्चय ही श्रीकृष्ण का दिव्य शरीर नश्वर नहीं है। वे ठीक सूर्य के समान हैं, और माया मेघ के समान है। भौतिक जगत् में हम देख सकते हैं कि सूर्य है तथा मेघ और भिन्न-भिन्न तारे और लोक हैं। मेघ आकाश में इन सबको क्षणिक रूप से आच्छादित कर सकते हैं, किन्तु यह आवरण केवल हमारी सीमित दृष्टि को ही प्रतीत होता है। सूर्य, चन्द्रमा तथा तारे वस्तुतः आच्छादित नहीं होते। इसी प्रकार, माया परमेश्वर को आच्छादित नहीं कर सकती। अपनी अन्तरंगा शक्ति से वे अल्प बुद्धि वाले मनुष्यों के वर्ग के समक्ष प्रकट नहीं होते। जैसा इस अध्याय के तीसरे श्लोक में कहा गया है, करोड़ों-करोड़ों मनुष्यों में से कुछ इस मानव-जीवन में सिद्ध बनने का प्रयत्न करते हैं, और सहस्रों-सहस्रों ऐसे सिद्ध मनुष्यों में से कदाचित् ही कोई एक यह समझ पाता है कि भगवान् श्रीकृष्ण क्या हैं। यदि कोई निराकार ब्रह्म अथवा स्थानिक परमात्मा की अनुभूति से सिद्ध भी हो जाए, तो वह कृष्णभावनामृत में हुए बिना पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को सम्भवतः नहीं समझ सकता।