हि

अध्याय 7 · 27 / 30

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इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ २७ ॥

इच्छा—कामना; द्वेष—घृणा; समुत्थेन—से उत्पन्न; द्वन्द्व—द्वैत; मोहेन—से अभिभूत; भारत—हे भरतवंशी; सर्व—समस्त; भूतानि—जीव; सम्मोहम्—मोह में; सर्गे—सृष्टि में; यान्ति—जाते हैं; परन्तप—हे शत्रुओं का दमन करने वाले।

हे भरतवंशी [अर्जुन], हे शत्रुओं का दमन करने वाले, समस्त जीव कामना और घृणा के द्वैत से अभिभूत होकर मोह में जन्म लेते हैं।

जीव की वास्तविक स्वरूपगत स्थिति परमेश्वर के अधीन रहने की है, जो शुद्ध ज्ञानस्वरूप हैं। जब कोई इस शुद्ध ज्ञान से पृथक् होकर मोहग्रस्त हो जाता है, तब वह माया-शक्ति के वशीभूत हो जाता है और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को नहीं समझ पाता। यह माया-शक्ति कामना और घृणा के द्वैत में प्रकट होती है। कामना और घृणा के कारण अज्ञानी व्यक्ति परमेश्वर के साथ एकाकार होना चाहता है तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में श्रीकृष्ण से ईर्ष्या करता है। जो शुद्ध भक्त इस प्रकार मोहित अथवा कामना और घृणा से कलुषित नहीं हैं, वे समझ सकते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण अपनी अन्तरंगा शक्तियों के द्वारा प्रकट होते हैं; किन्तु जो द्वैत और अविद्या से मोहित हैं, वे यह सोचते हैं कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् भौतिक शक्तियों द्वारा सृजित हैं। यही उनका दुर्भाग्य है। ऐसे मोहित व्यक्ति, लक्षणतः, अपमान और सम्मान, दुःख और सुख, स्त्री और पुरुष, अच्छे और बुरे, आनन्द और पीड़ा आदि के द्वैतों में निवास करते हैं और यह सोचते हैं, “यह मेरी पत्नी है; यह मेरा घर है; मैं इस घर का स्वामी हूँ; मैं इस पत्नी का पति हूँ।” ये मोह के द्वैत हैं। जो इन द्वैतों से इस प्रकार मोहित हैं, वे पूर्णतः मूर्ख हैं और इसी कारण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को नहीं समझ सकते।