अध्याय 7 · 4 / 30
7.4
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ४ ॥
भूमिः—पृथ्वी; आपः—जल; अनलः—अग्नि; वायुः—वायु; खम्—आकाश; मनः—मन; बुद्धिः—बुद्धि; एव—निश्चय ही; च—तथा; अहंकारः—मिथ्या अहंकार; इति—इस प्रकार; इयम्—ये सब; मे—मेरी; भिन्ना—पृथक्; प्रकृतिः—शक्तियाँ; अष्टधा—कुल आठ।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा मिथ्या अहंकार—ये आठ मिलकर मेरी पृथक् भौतिक शक्तियाँ हैं।
ईश्वर का विज्ञान ईश्वर की स्वरूपगत स्थिति तथा उनकी विविध शक्तियों का विश्लेषण करता है। भौतिक प्रकृति को प्रकृति कहते हैं, अर्थात् अपने विभिन्न पुरुष-अवतारों (विस्तारों) में भगवान् की शक्ति, जैसा कि सात्वत तन्त्र में वर्णित है:
viṣṇos tu trīṇi rūpāṇi puruṣākhyāny atho viduḥ
ekantu mahataḥ sraṣṭṛ dvitīyaṁ tv aṇḍa-saṁsthitam
tṛtīyaṁ sarvabhūta-sthaṁ tāni jñātvā vimucyate
“भौतिक सृष्टि के लिए भगवान् श्रीकृष्ण का पूर्ण विस्तार तीन विष्णुओं का रूप धारण करता है। प्रथम, महाविष्णु, समग्र भौतिक शक्ति की सृष्टि करते हैं, जो महत्तत्त्व के नाम से जानी जाती है। द्वितीय, गर्भोदकशायी विष्णु, प्रत्येक ब्रह्माण्ड में विविधता उत्पन्न करने हेतु समस्त ब्रह्माण्डों में प्रवेश करते हैं। तृतीय, क्षीरोदकशायी विष्णु, समस्त ब्रह्माण्डों में सर्वव्यापक परमात्मा के रूप में व्याप्त हैं और परमात्मा के नाम से जाने जाते हैं, जो परमाणुओं के भीतर भी विद्यमान हैं। जो कोई इन तीनों विष्णुओं को जान लेता है, वह भौतिक बन्धन से मुक्त हो सकता है।”
यह भौतिक जगत् भगवान् की शक्तियों में से एक का अस्थायी प्रकटीकरण है। भौतिक जगत् की समस्त क्रियाएँ भगवान् श्रीकृष्ण के इन तीन विष्णु-विस्तारों द्वारा संचालित होती हैं। इन पुरुषों को अवतार कहा जाता है। सामान्यतः जो ईश्वर (श्रीकृष्ण) के विज्ञान को नहीं जानता, वह यह मान बैठता है कि यह भौतिक जगत् जीवों के भोग के लिए है तथा जीव ही भौतिक शक्ति के कारण (पुरुष), नियन्ता और भोक्ता हैं। भगवद्गीता के अनुसार यह नास्तिक निष्कर्ष मिथ्या है। विचाराधीन श्लोक में कहा गया है कि श्रीकृष्ण ही भौतिक प्रकटीकरण के आदि कारण हैं। श्रीमद्भागवत भी इसकी पुष्टि करता है। भौतिक प्रकटीकरण के उपादान भगवान् की पृथक् शक्तियाँ हैं। यहाँ तक कि ब्रह्मज्योति, जो निर्विशेषवादियों का परम लक्ष्य है, आध्यात्मिक आकाश में प्रकट एक आध्यात्मिक शक्ति है। ब्रह्मज्योति में वैसी आध्यात्मिक विविधताएँ नहीं हैं जैसी वैकुण्ठलोकों में हैं, और निर्विशेषवादी इसी ब्रह्मज्योति को परम नित्य लक्ष्य के रूप में स्वीकार करता है। परमात्मा का प्रकटीकरण भी क्षीरोदकशायी विष्णु का एक अस्थायी सर्वव्यापक पक्ष है। आध्यात्मिक जगत् में परमात्मा का प्रकटीकरण नित्य नहीं है। अतएव यथार्थ परम सत्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण हैं। वे पूर्ण ऊर्जावान् पुरुष हैं, और उनकी विभिन्न पृथक् तथा अन्तरंग शक्तियाँ हैं।
भौतिक शक्ति में प्रमुख प्रकटीकरण आठ हैं, जैसा ऊपर बताया गया। इनमें से प्रथम पाँच प्रकटीकरण, अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश, पञ्च महाभूत अथवा स्थूल सृष्टि कहलाते हैं, जिनके भीतर पाँच इन्द्रिय-विषय सम्मिलित हैं। ये भौतिक शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध के प्रकटीकरण हैं। भौतिक विज्ञान इन दस विषयों तक ही सीमित है, इससे अधिक कुछ नहीं। किन्तु अन्य तीन विषयों, अर्थात् मन, बुद्धि तथा मिथ्या अहंकार की भौतिकतावादी उपेक्षा करते हैं। मानसिक क्रियाओं से सम्बद्ध दार्शनिक भी ज्ञान में पूर्ण नहीं हैं, क्योंकि वे परम स्रोत श्रीकृष्ण को नहीं जानते। मिथ्या अहंकार—“मैं हूँ” तथा “यह मेरा है”—जो भौतिक अस्तित्व का मूल सिद्धान्त है, में भौतिक क्रियाओं हेतु दस इन्द्रियाँ सम्मिलित हैं। बुद्धि समग्र भौतिक सृष्टि की ओर संकेत करती है, जिसे महत्तत्त्व कहते हैं। अतएव भगवान् की आठ पृथक् शक्तियों से ही भौतिक जगत् के चौबीस तत्त्व प्रकट होते हैं, जो नास्तिक सांख्य-दर्शन के विषय हैं; ये मूलतः श्रीकृष्ण की शक्तियों से उद्भूत हैं और उनसे पृथक् हैं, किन्तु अल्पज्ञ नास्तिक सांख्य-दार्शनिक श्रीकृष्ण को समस्त कारणों के कारण के रूप में नहीं जानते। सांख्य-दर्शन में विवेचन का विषय केवल श्रीकृष्ण की बहिरंगा शक्ति का प्रकटीकरण है, जैसा कि भगवद्गीता में वर्णित है।