अध्याय 8 · 1 / 28
8.1
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ १ ॥
अर्जुनः उवाच—अर्जुन ने कहा; किम्—क्या; तत्—वह; ब्रह्म—ब्रह्म; किम्—क्या; अध्यात्मम्—आत्मा; किम्—क्या; कर्म—सकाम कर्म; पुरुषोत्तम—हे परम पुरुष; अधिभूतम्—भौतिक प्रकटीकरण; च—तथा; किम्—क्या; प्रोक्तम्—कहलाता है; अधिदैवम्—देवता; किम्—क्या; उच्यते—कहलाता है।
अर्जुन ने पूछा: हे मेरे प्रभु, हे परम पुरुष, ब्रह्म क्या है? आत्मा क्या है? सकाम कर्म क्या हैं? यह भौतिक प्रकटीकरण क्या है? और देवता कौन हैं? कृपया मुझे यह समझाइए।
इस अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण “ब्रह्म क्या है?” से आरम्भ करते हुए अर्जुन के इन विभिन्न प्रश्नों का उत्तर देते हैं। भगवान् कर्म अर्थात् सकाम कर्म, भक्ति तथा योग के सिद्धान्तों, और शुद्ध रूप में भक्ति की भी व्याख्या करते हैं। श्रीमद्भागवत में बताया गया है कि परम सत्य ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् के रूप में जाना जाता है। इसके अतिरिक्त जीव अर्थात् व्यष्टि आत्मा को भी ब्रह्म कहा जाता है। अर्जुन आत्मा के विषय में भी पूछते हैं, जिसका अभिप्राय शरीर, आत्मा तथा मन से है। वैदिक कोश के अनुसार आत्मा से मन, आत्मा, शरीर तथा इन्द्रियों का भी बोध होता है।
अर्जुन ने परमेश्वर को पुरुषोत्तम, परम पुरुष कहकर सम्बोधित किया है, जिसका अर्थ है कि वे ये प्रश्न केवल एक मित्र से नहीं, अपितु परम पुरुष से पूछ रहे थे, उन्हें वह परम प्रमाण जानते हुए जो निश्चयात्मक उत्तर देने में समर्थ है।