अध्याय 8 · 2 / 28
8.2
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥
अधियज्ञः—यज्ञ के स्वामी; कथम्—कैसे; कः—कौन; अत्र—यहाँ; देहे—शरीर में; अस्मिन्—इसमें; मधुसूदन—हे मधुसूदन; प्रयाण-काले—मृत्यु के समय; च—तथा; कथम्—कैसे; ज्ञेयः—जाने जाते हैं; असि—आप; नियत-आत्मभिः—आत्मसंयमी जनों द्वारा।
हे मधुसूदन, यज्ञ के ये स्वामी शरीर में किस प्रकार निवास करते हैं, और शरीर के किस भाग में निवास करते हैं? और भक्ति में संलग्न जन मृत्यु के समय आपको कैसे जान सकते हैं?
यज्ञ के स्वामी से अभिप्राय इन्द्र तथा विष्णु से है। ब्रह्मा तथा शिव सहित जो आदि देवता हैं, उनमें विष्णु प्रमुख हैं, और प्रशासनिक देवताओं में इन्द्र प्रमुख हैं। इन्द्र तथा विष्णु, दोनों की यज्ञानुष्ठान द्वारा आराधना की जाती है। किन्तु यहाँ अर्जुन पूछते हैं कि वस्तुतः यज्ञ के स्वामी कौन हैं, और भगवान् जीव के शरीर के भीतर किस प्रकार निवास करते हैं।
अर्जुन भगवान् को मधुसूदन कहकर सम्बोधित करते हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण ने एक बार मधु नामक असुर का वध किया था। वस्तुतः ये प्रश्न, जो सन्देह के स्वभाव के हैं, अर्जुन के मन में उठने नहीं चाहिए थे, क्योंकि अर्जुन कृष्णभावनाभावित भक्त हैं। अतः ये सन्देह असुरों के समान हैं। चूँकि श्रीकृष्ण असुरों का वध करने में अत्यन्त निपुण हैं, अतः यहाँ अर्जुन उन्हें मधुसूदन कहकर सम्बोधित करते हैं, ताकि श्रीकृष्ण अर्जुन के मन में उठने वाले इन आसुरिक सन्देहों का वध कर सकें।
इस श्लोक में प्रयाण-काल शब्द अत्यन्त सार्थक है, क्योंकि हम जीवन में जो कुछ करते हैं, उसकी परीक्षा मृत्यु के समय होगी। अर्जुन को भय है कि मृत्यु के समय जो कृष्णभावनामृत में स्थित हैं, वे परमेश्वर को विस्मृत कर देंगे, क्योंकि उस समय शरीर की क्रियाएँ अस्तव्यस्त हो जाती हैं और मन आतंकित अवस्था में हो सकता है। अतः महान् भक्त महाराज कुलशेखर प्रार्थना करते हैं, “हे मेरे प्रभु, मैं अभी स्वस्थ रहते हुए ही तत्क्षण मर जाऊँ, ताकि मेरे मन का हंस आपके चरणकमलों की नाल में प्रवेश कर सके।” यह रूपक इसलिए प्रयुक्त हुआ है, क्योंकि हंस प्रायः कमल-पुष्प की नाल में प्रवेश करने में आनन्द लेता है—इसी प्रकार शुद्ध भक्त का मन भगवान् के चरणकमलों की ओर आकृष्ट होता है। महाराज कुलशेखर को भय है कि मृत्यु के क्षण में उनका कण्ठ इतना अवरुद्ध हो जाएगा कि वे पवित्र नामों का उच्चारण नहीं कर सकेंगे, अतः “तत्क्षण मर जाना” ही श्रेयस्कर है। अर्जुन प्रश्न करते हैं कि ऐसे समय में मनुष्य का मन श्रीकृष्ण के चरणकमलों पर किस प्रकार स्थिर रह सकता है।