हि

अध्याय 8 · 10 / 28

8.10

प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्य-
क्स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥

प्रयाण-काले—मृत्यु के समय; मनसा—मन के द्वारा; अचलेन—विचलित हुए बिना; भक्त्या—पूर्ण भक्ति में; युक्तः—संलग्न; योग-बलेन—योगशक्ति के बल से; च—भी; एव—निश्चय ही; भ्रुवोः—दोनों भौंहों के; मध्ये—बीच में; प्राणम्—प्राणवायु; आवेश्य—स्थापित करके; सम्यक्—पूर्ण रूप से; सः—वह; तम्—उस; परम्—दिव्य; पुरुषम्—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; उपैति—प्राप्त करता है; दिव्यम्—आध्यात्मिक धाम में।

जो मनुष्य मृत्यु के समय अपनी प्राणवायु को दोनों भौंहों के बीच स्थिर कर लेता है और पूर्ण भक्ति में परमेश्वर के स्मरण में अपने को संलग्न करता है, वह निश्चय ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को प्राप्त करेगा।

इस श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मृत्यु के समय मन को भक्ति में परमेश्वर पर स्थिर करना चाहिए। जो योग में अभ्यस्त हैं, उनके लिए अनुशंसा है कि वे प्राणशक्ति को दोनों भौंहों के बीच ऊपर उठाएँ, किन्तु जो शुद्ध भक्त ऐसे योग का अभ्यास नहीं करता, उसके लिए मन को सदैव कृष्णभावनामृत में संलग्न रखना चाहिए, ताकि मृत्यु के समय वह भगवान् की कृपा से परमेश्वर का स्मरण कर सके। इसकी व्याख्या चौदहवें श्लोक में हुई है।

इस श्लोक में योग-बलेन शब्द का विशेष प्रयोग सार्थक है, क्योंकि योग के अभ्यास के बिना मनुष्य मृत्यु के समय इस दिव्य भाव-अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकता। जब तक मनुष्य किसी योग-प्रणाली में, विशेषतः भक्तियोग की प्रणाली में, अभ्यस्त न हो, तब तक वह मृत्यु के समय सहसा परमेश्वर का स्मरण नहीं कर सकता। चूँकि मृत्यु के समय मनुष्य का मन अत्यन्त विचलित होता है, अतः मनुष्य को अपने जीवनकाल में योग के द्वारा दिव्यता का अभ्यास करना चाहिए।