अध्याय 8 · 11 / 28
8.11
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥
यत्—जो; अक्षरम्—अक्षय; वेद-विदः—वेदों में पारंगत व्यक्ति; वदन्ति—कहते हैं; विशन्ति—प्रवेश करते हैं; यत्—जिसमें; यतयः—महान् ऋषि; वीत-रागाः—संन्यास आश्रम में; यत्—जिसकी; इच्छन्तः—इच्छा करते हुए; ब्रह्मचर्यम्—ब्रह्मचर्य; चरन्ति—अभ्यास करते हैं; तत्—उस; ते—तुम्हें; पदम्—स्थिति; संग्रहेण—संक्षेप में; प्रवक्ष्ये—मैं समझाऊँगा।
वेदों में पारंगत जन, जो ओंकार का उच्चारण करते हैं और जो संन्यास आश्रम में महान् ऋषि हैं, ब्रह्म में प्रवेश करते हैं। ऐसी सिद्धि की इच्छा करते हुए मनुष्य ब्रह्मचर्य का अभ्यास करता है। अब मैं तुम्हें वह प्रक्रिया समझाऊँगा, जिसके द्वारा मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
भगवान् श्रीकृष्ण समझाते हैं कि ब्रह्म, यद्यपि अद्वितीय है, तथापि उसके विभिन्न प्रकटीकरण तथा पक्ष हैं। निर्विशेषवादियों के लिए ओम् अक्षर ब्रह्म के साथ अभिन्न है। श्रीकृष्ण यहाँ उस निराकार ब्रह्म की व्याख्या करते हैं, जिसमें संन्यास आश्रम के ऋषि प्रवेश करते हैं।
वैदिक ज्ञान-प्रणाली में विद्यार्थियों को प्रारम्भ से ही ओम् का उच्चारण करना तथा पूर्ण ब्रह्मचर्य में आध्यात्मिक गुरु के साथ रहकर परम निराकार ब्रह्म को जानना सिखाया जाता है। इस प्रकार वे ब्रह्म के दो पक्षों का साक्षात्कार करते हैं। विद्यार्थी की आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह अभ्यास अत्यन्त आवश्यक है, किन्तु इस समय ऐसा ब्रह्मचारी (अविवाहित ब्रह्मचर्यपालक) जीवन तनिक भी सम्भव नहीं है। संसार की सामाजिक रचना इतनी बदल गई है कि विद्यार्थी-जीवन के आरम्भ से ही ब्रह्मचर्य के अभ्यास की कोई सम्भावना नहीं है। सम्पूर्ण विश्व में ज्ञान के विभिन्न विभागों हेतु अनेक संस्थान हैं, किन्तु कोई मान्यताप्राप्त संस्थान नहीं है, जहाँ विद्यार्थियों को ब्रह्मचर्य के सिद्धान्तों में शिक्षित किया जा सके। जब तक मनुष्य ब्रह्मचर्य का अभ्यास न करे, तब तक आध्यात्मिक जीवन में उन्नति अत्यन्त कठिन है। अतः भगवान् चैतन्य ने कलियुग के इस युग हेतु शास्त्रीय आदेशों के अनुसार घोषणा की है कि भगवान् श्रीकृष्ण के पवित्र नाम के जप के अतिरिक्त परमेश्वर के साक्षात्कार की कोई प्रक्रिया सम्भव नहीं है: हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे, हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे।