हि

अध्याय 8 · 18 / 28

8.18

अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥

अव्यक्तात्—अव्यक्त से; व्यक्तयः—जीव; सर्वाः—समस्त; प्रभवन्ति—प्रकट होते हैं; अहः-आगमे—दिन के आरम्भ में; रात्रि-आगमे—रात्रि के आगमन पर; प्रलीयन्ते—विनष्ट हो जाते हैं; तत्र—वहाँ; एव—निश्चय ही; अव्यक्त—अव्यक्त; संज्ञके—कहलाने वाले में।

जब ब्रह्मा का दिन प्रकट होता है, तब जीवों का यह समूह अस्तित्व में आता है, और ब्रह्मा की रात्रि के आगमन पर वे सब विनष्ट हो जाते हैं।

अल्पबुद्धि जीव इस भौतिक जगत् के भीतर रहने का प्रयत्न करते हैं और तदनुसार विभिन्न लोक-व्यवस्थाओं में उन्नत तथा अवनत होते रहते हैं। ब्रह्मा के दिन के समय वे अपनी क्रियाएँ प्रदर्शित करते हैं, और ब्रह्मा की रात्रि के आगमन पर वे विनष्ट हो जाते हैं। दिन में वे भौतिक क्रियाओं हेतु विभिन्न शरीर प्राप्त करते हैं, और रात्रि में ये शरीर नष्ट हो जाते हैं। जीव (व्यष्टि आत्माएँ) विष्णु के शरीर में सुसंहत रहते हैं और बारम्बार ब्रह्मा के दिन के आगमन पर प्रकट होते हैं। जब ब्रह्मा का जीवन अन्ततः समाप्त हो जाता है, तब वे सब विनष्ट हो जाते हैं और करोड़ों-करोड़ों वर्षों तक अव्यक्त रहते हैं। अन्ततः जब किसी अन्य कल्प में ब्रह्मा का पुनः जन्म होता है, तब वे फिर से प्रकट हो जाते हैं। इस प्रकार जीव भौतिक जगत् द्वारा मोहित रहते हैं। तथापि जो बुद्धिमान् प्राणी कृष्णभावनामृत को ग्रहण करते हैं और भक्ति में हरे कृष्ण, हरे राम का जप करते हैं, वे इसी जीवन में भी अपने को कृष्ण के आध्यात्मिक लोक में स्थानान्तरित कर लेते हैं और वहाँ नित्य आनन्दमय हो जाते हैं, ऐसे पुनर्जन्मों के अधीन नहीं रहते।