अध्याय 8 · 23 / 28
8.23
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥
यत्र—जिस; काले—समय; तु—किन्तु; अनावृत्तिम्—अवापसी; आवृत्तिम्—वापसी; च—भी; एव—निश्चय ही; योगिनः—विभिन्न प्रकार के योगियों का; प्रयाताः—जो जाता है; यान्ति—प्रस्थान करता है; तम्—उस; कालम्—समय; वक्ष्यामि—वर्णन करता हूँ; भरतर्षभ—हे भरतश्रेष्ठ।
हे भरतश्रेष्ठ, अब मैं तुम्हें वे विभिन्न काल समझाऊँगा, जिनमें इस जगत् से प्रयाण करते हुए मनुष्य लौटता अथवा नहीं लौटता।
परम भगवान् के अनन्य भक्त, जो पूर्णतः शरणागत आत्माएँ हैं, इस बात की चिन्ता नहीं करते कि वे कब अपने शरीर का त्याग करते हैं अथवा किस विधि से। वे सब कुछ कृष्ण के हाथों में छोड़ देते हैं और इस प्रकार सरलतापूर्वक तथा प्रसन्नतापूर्वक भगवान् के पास लौट जाते हैं। किन्तु जो अनन्य भक्त नहीं हैं और जो इसके स्थान पर कर्मयोग, ज्ञानयोग, हठयोग आदि आध्यात्मिक साक्षात्कार की विधियों पर निर्भर रहते हैं, उन्हें उपयुक्त समय पर शरीर त्यागना पड़ता है, और इसी से यह सुनिश्चित होता है कि वे जन्म-मृत्यु के जगत् में लौटेंगे अथवा नहीं।
यदि योगी पूर्ण है, तो वह इस भौतिक जगत् को छोड़ने के लिए समय तथा स्थान चुन सकता है, किन्तु यदि वह उतना पूर्ण नहीं है, तो उसे प्रकृति की इच्छा पर ही प्रयाण करना पड़ता है। शरीर त्यागने तथा न लौटने का सर्वाधिक उपयुक्त समय भगवान् इन श्लोकों में समझा रहे हैं। आचार्य बलदेव विद्याभूषण के अनुसार, यहाँ प्रयुक्त संस्कृत शब्द काल समय के अधिष्ठाता देवता को सूचित करता है।