अध्याय 8 · 24 / 28
8.24
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥
अग्निः—अग्नि; ज्योतिः—प्रकाश; अहः—दिन; शुक्लः—शुक्ल; षट्-मासाः—छह मास; उत्तरायणम्—जब सूर्य उत्तर की ओर गमन करता है; तत्र—वहाँ; प्रयाताः—जो जाता है; गच्छन्ति—प्रयाण करता है; ब्रह्म—परब्रह्म; ब्रह्म-विदः—जो परब्रह्म को जानता है; जनाः—व्यक्ति।
जो परब्रह्म को जानते हैं, वे अग्निदेव के प्रभाव-काल में, प्रकाश में, शुभ क्षण में, चन्द्रमा के शुक्लपक्ष में तथा उन छह मासों में जगत् से प्रयाण करते हैं, जब सूर्य उत्तर की ओर गमन करता है।
जब अग्नि, प्रकाश, दिन तथा चन्द्रमा का उल्लेख होता है, तब यह समझना चाहिए कि इन सब पर विभिन्न अधिष्ठाता देवता हैं, जो आत्मा के प्रयाण की व्यवस्था करते हैं। मृत्यु के समय जीव एक नए जीवन के मार्ग पर अग्रसर होता है। यदि कोई ऊपर निर्दिष्ट समय पर, चाहे संयोगवश अथवा व्यवस्था द्वारा, शरीर त्यागता है, तो उसके लिए निराकार ब्रह्मज्योति प्राप्त करना सम्भव है। योगाभ्यास में उन्नत योगी शरीर त्यागने के समय तथा स्थान की व्यवस्था कर सकते हैं। अन्यों का कोई नियन्त्रण नहीं रहता—यदि संयोगवश वे किसी शुभ क्षण में प्रयाण करते हैं, तो वे जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं लौटेंगे, किन्तु यदि नहीं, तो उनके लौटने की पूरी सम्भावना रहती है। तथापि कृष्णभावनामृत में स्थित शुद्ध भक्त के लिए लौटने का कोई भय नहीं है, चाहे वह शुभ अथवा अशुभ क्षण में, संयोगवश अथवा व्यवस्था द्वारा शरीर त्यागे।