अध्याय 8 · 26 / 28
8.26
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥
शुक्ल—प्रकाश; कृष्णे—अन्धकार; गती—प्रयाण-मार्ग; हि—निश्चय ही; एते—ये सब; जगतः—भौतिक जगत् का; शाश्वते—वेद; मते—मत में; एकया—एक से; याति—जाता है; अनावृत्तिम्—अवापसी; अन्यया—अन्य से; आवर्तते—लौट आता है; पुनः—पुनः।
वेदों के अनुसार, इस जगत् से प्रयाण के दो मार्ग हैं—एक प्रकाश में और एक अन्धकार में। जब मनुष्य प्रकाश में प्रयाण करता है, तब वह नहीं लौटता; किन्तु जब वह अन्धकार में प्रयाण करता है, तब वह लौट आता है।
प्रयाण तथा वापसी का यही वर्णन आचार्य बलदेव विद्याभूषण ने छान्दोग्य उपनिषद् से उद्धृत किया है। इस प्रकार, जो सकाम कर्मी तथा दार्शनिक कल्पनावादी हैं, वे अनादि काल से निरन्तर आते तथा जाते रहते हैं। वस्तुतः वे परम मोक्ष को प्राप्त नहीं करते, क्योंकि वे कृष्ण की शरण नहीं लेते।