हि

अध्याय 8 · 25 / 28

8.25

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५ ॥

धूमः—धूम; रात्रिः—रात्रि; तथा—भी; कृष्णः—कृष्णपक्ष; षट्-मासाः—छह मास; दक्षिण-अयनम्—जब सूर्य दक्षिण की ओर गमन करता है; तत्र—वहाँ; चान्द्रमसम्—चन्द्रलोक; ज्योतिः—प्रकाश; योगी—योगी; प्राप्य—प्राप्त करके; निवर्तते—लौटता है।

जो योगी धूम में, रात्रि में, कृष्णपक्ष में अथवा उन छह मासों में जगत् से प्रयाण करता है, जब सूर्य दक्षिण की ओर जाता है, अथवा जो चन्द्रलोक को प्राप्त करता है, वह पुनः लौट आता है।

श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध में हमें बताया गया है कि जो पृथ्वी पर सकाम कर्मों तथा यज्ञ-विधियों में निपुण होते हैं, वे मृत्यु के समय चन्द्रलोक को प्राप्त करते हैं। ये उन्नत आत्माएँ चन्द्रमा पर लगभग दस हज़ार वर्षों (देवताओं की गणना के अनुसार) तक निवास करती हैं और सोम-रस का पान करते हुए जीवन का आनन्द भोगती हैं। वे अन्ततः पृथ्वी पर लौट आती हैं। इसका अर्थ है कि चन्द्रमा पर जीवों की उच्चतर श्रेणियाँ हैं, यद्यपि वे स्थूल इन्द्रियों द्वारा अनुभव में नहीं आतीं।