अध्याय 8 · 8 / 28
8.8
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥ ८ ॥
अभ्यास—अभ्यास; योग-युक्तेन—ध्यान में संलग्न होकर; चेतसा—मन तथा बुद्धि द्वारा; न अन्य-गामिना—विचलित हुए बिना; परमम्—परम; पुरुषम्—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; दिव्यम्—दिव्य; याति—प्राप्त करता है; पार्थ—हे पृथापुत्र; अनुचिन्तयन्—निरन्तर चिन्तन करते हुए।
हे पार्थ [अर्जुन], जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का ध्यान करता है, अपने मन को निरन्तर मेरे स्मरण में संलग्न रखता है, मार्ग से विचलित नहीं होता, वह निश्चय ही मुझे प्राप्त करता है।
इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण अपने स्मरण के महत्त्व पर बल देते हैं। श्रीकृष्ण की स्मृति हरे कृष्ण महामन्त्र के जप से पुनर्जीवित होती है। जप करने तथा परमेश्वर के ध्वनि-कम्पन का श्रवण करने के इस अभ्यास से मनुष्य के कान, जिह्वा तथा मन संलग्न होते हैं। इस योगमय ध्यान का अभ्यास करना अत्यन्त सरल है, और यह मनुष्य को परमेश्वर की प्राप्ति में सहायता करता है। पुरुष का अर्थ है भोक्ता। यद्यपि जीव परमेश्वर की तटस्थ शक्ति से सम्बद्ध हैं, तथापि वे भौतिक कल्मष में हैं। वे अपने को भोक्ता मानते हैं, किन्तु वे परम भोक्ता नहीं हैं। यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि परम भोक्ता पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, जो नारायण, वासुदेव आदि के रूप में अपने विभिन्न प्रकटीकरणों तथा पूर्ण विस्तारों में विद्यमान हैं।
भक्तगण हरे कृष्ण का जप करके अपनी आराधना के विषय परमेश्वर का, उनके किसी भी रूप में—नारायण, श्रीकृष्ण, श्रीराम आदि—निरन्तर चिन्तन कर सकते हैं। यह अभ्यास उसे शुद्ध करेगा, और उसके जीवन के अन्त में, उसके निरन्तर जप के कारण, वह भगवद्धाम में स्थानान्तरित कर दिया जाएगा। योगाभ्यास अन्तःस्थ परमात्मा का ध्यान है; इसी प्रकार हरे कृष्ण का जप करके मनुष्य अपने मन को सदैव परमेश्वर पर स्थिर करता है। मन चंचल है, अतः मन को बलपूर्वक श्रीकृष्ण का चिन्तन करने में संलग्न करना आवश्यक है। एक उदाहरण प्रायः दिया जाता है कि वह झींगुर, जो तितली बनने का चिन्तन करता है, इसी जीवन में तितली में परिणत हो जाता है। इसी प्रकार, यदि हम निरन्तर श्रीकृष्ण का चिन्तन करें, तो यह निश्चित है कि अपने जीवन के अन्त में हमारी शारीरिक रचना श्रीकृष्ण के समान ही होगी।