हि

अध्याय 8 · 7 / 28

8.7

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः ॥ ७ ॥

तस्मात्—अतः; सर्वेषु—सभी; कालेषु—समय; माम्—मुझको; अनुस्मर—स्मरण करते रहो; युध्य—युद्ध करो; च—भी; मयि—मुझमें; अर्पित—समर्पित; मनः—मन; बुद्धिः—बुद्धि; माम्—मुझको; एव—निश्चय ही; एष्यसि—प्राप्त करोगे; असंशयः—नि:सन्देह।

अतः हे अर्जुन, तुम्हें सदैव मेरा अर्थात् श्रीकृष्ण का स्मरण करना चाहिए और साथ ही युद्ध करने के अपने विहित कर्तव्य का पालन करना चाहिए। अपनी क्रियाओं को मुझे समर्पित कर तथा अपने मन एवं बुद्धि को मुझ पर स्थिर कर, तुम नि:सन्देह मुझे प्राप्त करोगे।

अर्जुन को दी गई यह शिक्षा भौतिक कार्यों में संलग्न समस्त मनुष्यों के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भगवान् यह नहीं कहते कि मनुष्य को अपने विहित कर्तव्य अथवा कार्य त्याग देने चाहिए। मनुष्य उन्हें जारी रख सकता है और साथ ही हरे कृष्ण का जप करते हुए श्रीकृष्ण का चिन्तन कर सकता है। इससे मनुष्य भौतिक कल्मष से मुक्त होगा और अपने मन एवं बुद्धि को श्रीकृष्ण में संलग्न करेगा। श्रीकृष्ण के नामों का जप करने से मनुष्य नि:सन्देह परम लोक, कृष्णलोक में स्थानान्तरित कर दिया जाएगा।