अध्याय 9 · 10 / 34
9.10
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥
मया—मेरे द्वारा; अध्यक्षेण—अध्यक्षता द्वारा; प्रकृतिः—भौतिक प्रकृति; सूयते—प्रकट करती है; स—सहित; चराचरम्—चर तथा अचर; हेतुना—इस कारण से; अनेन—इस; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; जगत्—विश्व-प्रकटीकरण; विपरिवर्तते—कार्य कर रहा है।
हे कुन्तीपुत्र! यह भौतिक प्रकृति मेरी अध्यक्षता में कार्य कर रही है, और यह समस्त चर तथा अचर प्राणियों को उत्पन्न कर रही है। इसके नियम से यह प्रकटीकरण बारम्बार सृजित तथा संहृत होता है।
यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि परमेश्वर, यद्यपि भौतिक जगत् की समस्त क्रियाओं से पृथक् हैं, तथापि परम निर्देशक बने रहते हैं। परमेश्वर परम इच्छा तथा इस भौतिक प्रकटीकरण की पृष्ठभूमि हैं, किन्तु प्रबन्धन भौतिक प्रकृति द्वारा संचालित किया जा रहा है। श्रीकृष्ण भगवद्गीता में यह भी कहते हैं कि विभिन्न रूपों तथा योनियों के समस्त जीवों का “मैं पिता हूँ।” पिता सन्तान हेतु माता के गर्भ में बीज देता है, और इसी प्रकार परमेश्वर अपनी केवल दृष्टि-मात्र से समस्त जीवों को भौतिक प्रकृति के गर्भ में अन्तःक्षिप्त करते हैं, और वे अपने पूर्व इच्छाओं तथा कर्मों के अनुसार विभिन्न रूपों तथा योनियों में बाहर आते हैं। ये समस्त जीव, यद्यपि परमेश्वर की दृष्टि में जन्म लेते हैं, तथापि अपने पूर्व कर्मों तथा इच्छाओं के अनुसार अपनी भिन्न-भिन्न देह धारण करते हैं। अतः भगवान् इस भौतिक सृष्टि से प्रत्यक्ष रूप से आसक्त नहीं हैं। वे केवल भौतिक प्रकृति पर दृष्टि डालते हैं; इस प्रकार भौतिक प्रकृति सक्रिय हो जाती है, और सब कुछ तुरन्त सृजित हो जाता है। चूँकि वे भौतिक प्रकृति पर दृष्टि डालते हैं, अतः निःसन्देह परमेश्वर की ओर से क्रिया होती है, किन्तु भौतिक जगत् के प्रकटीकरण से उनका प्रत्यक्ष रूप से कोई सरोकार नहीं है। इसका उदाहरण स्मृति में दिया गया है: जब किसी व्यक्ति के समक्ष कोई सुगन्धित पुष्प होता है, तब उस सुगन्ध का स्पर्श व्यक्ति की घ्राण-शक्ति द्वारा होता है, फिर भी घ्राण तथा पुष्प एक-दूसरे से पृथक् रहते हैं। भौतिक जगत् तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के मध्य भी ऐसा ही सम्बन्ध है; वास्तव में इस भौतिक जगत् से उनका कोई सरोकार नहीं है, किन्तु वे अपनी दृष्टि से सृजन करते हैं तथा आदेश देते हैं। संक्षेप में, भौतिक प्रकृति, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की अध्यक्षता के बिना, कुछ भी नहीं कर सकती। फिर भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् समस्त भौतिक क्रियाओं से अनासक्त हैं।