अध्याय 9 · 33 / 34
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किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥
किम्—कितने; पुनः—फिर; ब्राह्मणाः—ब्राह्मण; पुण्याः—धर्मात्मा; भक्ताः—भक्तगण; राजर्षयः—सन्त राजा; तथा—भी; अनित्यम्—अनित्य; असुखम्—दुःखमय; लोकम्—लोक; इमम्—इस; प्राप्य—प्राप्त करके; भजस्व—भक्ति में संलग्न होते हैं; माम्—मेरी।
तब फिर वे ब्राह्मण, धर्मात्मा, भक्तगण तथा सन्त राजा कितने अधिक श्रेष्ठ हैं, जो इस अनित्य एवं दुःखमय जगत् में मेरी प्रेममयी भक्ति में संलग्न रहते हैं।
इस भौतिक जगत् में मनुष्यों के वर्गीकरण हैं, किन्तु अन्ततः यह जगत् किसी के लिए भी सुखद स्थान नहीं है। यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है, अनित्यम् असुखं लोकम्—यह जगत् अनित्य है और दुःखों से परिपूर्ण है, किसी भी विवेकी सज्जन के निवास योग्य नहीं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा इस जगत् को अनित्य तथा दुःखों से पूर्ण घोषित किया गया है। कुछ दार्शनिक, विशेषतः लघु दार्शनिक, कहते हैं कि यह जगत् मिथ्या है, किन्तु भगवद्गीता से हम समझ सकते हैं कि यह जगत् मिथ्या नहीं है; यह अनित्य है। अनित्य तथा मिथ्या में भेद है। यह जगत् अनित्य है, किन्तु एक अन्य जगत् भी है जो नित्य है। यह जगत् दुःखमय है, किन्तु वह दूसरा जगत् नित्य तथा आनन्दमय है।
अर्जुन एक सन्त राजवंश में उत्पन्न हुए थे। उनसे भी भगवान् कहते हैं, “मेरी भक्ति को ग्रहण करो और शीघ्र भगवद्धाम, अपने घर लौट आओ।” किसी को भी इस अनित्य जगत् में, जो दुःखों से इतना परिपूर्ण है, नहीं रहना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के हृदय से लग जाना चाहिए, जिससे वह नित्य सुखी रह सके। परम भगवान् की भक्ति ही एकमात्र वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा समस्त श्रेणियों के मनुष्यों की समस्त समस्याएँ हल हो सकती हैं। अतः प्रत्येक व्यक्ति को कृष्णभावनामृत ग्रहण करके अपने जीवन को सिद्ध बना लेना चाहिए।