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अध्याय 9 · 32 / 34

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मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ ३२ ॥

माम्—मेरी; हि—निश्चय ही; पार्थ—हे पृथापुत्र; व्यपाश्रित्य—विशेष रूप से शरण लेकर; ये—जो कोई; अपि—भी; स्युः—होते हैं; पाप-योनयः—निम्न कुल में उत्पन्न; स्त्रियः—स्त्रियाँ; वैश्याः—वणिक् जन; तथा—भी; शूद्राः—निम्न श्रेणी के मनुष्य; ते अपि—वे भी; यान्ति—जाते हैं; पराम्—परम; गतिम्—गन्तव्य को।

हे पृथापुत्र! जो मेरी शरण ग्रहण करते हैं, वे भले ही निम्न कुल में उत्पन्न हों—स्त्रियाँ, वैश्य [वणिक्] तथा शूद्र [श्रमिक]—फिर भी परम गन्तव्य को प्राप्त कर सकते हैं।

यहाँ परम भगवान् द्वारा स्पष्ट रूप से घोषित किया गया है कि भक्ति में निम्न अथवा उच्च श्रेणी के मनुष्यों में कोई भेद नहीं है। जीवन की भौतिक धारणा में ऐसे विभाजन होते हैं, किन्तु भगवान् की दिव्य भक्ति में संलग्न व्यक्ति के लिए वे नहीं होते। प्रत्येक व्यक्ति परम गन्तव्य के लिए योग्य है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि निम्नतम जन भी, जिन्हें चाण्डाल (श्वपच) कहा जाता है, शुद्ध भक्त की संगति से उन्नत हो सकते हैं। अतः भक्ति तथा शुद्ध भक्त का मार्गदर्शन इतना प्रबल है कि निम्न तथा उच्च श्रेणी के मनुष्यों में कोई भेदभाव नहीं रहता; कोई भी इसे ग्रहण कर सकता है। शुद्ध भक्त की शरण ग्रहण करने वाला अत्यन्त सामान्य मनुष्य भी समुचित मार्गदर्शन से शुद्ध हो सकता है। भौतिक प्रकृति के विभिन्न गुणों के अनुसार मनुष्यों का वर्गीकरण किया जाता है—सत्त्वगुण (ब्राह्मण), रजोगुण (क्षत्रिय अथवा प्रशासक), रज-तमोगुण के मिश्रित गुण (वैश्य अथवा वणिक्), तथा तमोगुण (शूद्र अथवा श्रमिक)। इनसे निम्न जन चाण्डाल कहलाते हैं, और वे पापमय कुलों में उत्पन्न होते हैं। सामान्यतः जो पापमय कुलों में उत्पन्न होते हैं, उन्हें उच्च श्रेणियाँ स्वीकार नहीं करतीं। किन्तु भक्ति की प्रक्रिया तथा परम भगवान् का शुद्ध भक्त इतने प्रबल हैं कि समस्त निम्न श्रेणियाँ जीवन की परम सिद्धि को प्राप्त कर सकती हैं। यह तभी सम्भव है जब कोई श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करे। मनुष्य को पूर्ण रूप से श्रीकृष्ण की शरण लेनी होती है। तब वह महान् ज्ञानियों तथा योगियों से भी कहीं अधिक महान् बन सकता है।