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अध्याय 9 · 8 / 34

9.8

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८ ॥

प्रकृतिम्—भौतिक प्रकृति को; स्वाम्—अपने निज स्वरूप की; अवष्टभ्य—प्रवेश करके; विसृजामि—सृजन करता हूँ; पुनः पुनः—बारम्बार; भूत-ग्रामम्—ये समस्त विश्व-प्रकटीकरण; इमम्—यह; कृत्स्नम्—समस्त; अवशम्—स्वतः; प्रकृतेः—प्रकृति के बल से; वशात्—बाध्यता में।

सम्पूर्ण विश्व-व्यवस्था मेरे अधीन है। मेरी इच्छा से यह बारम्बार प्रकट होती है, और मेरी इच्छा से अन्त में इसका संहार होता है।

यह पदार्थ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की अपरा ऊर्जा का प्रकटीकरण है। इसे पहले कई बार समझाया जा चुका है। सृष्टि के समय, भौतिक ऊर्जा महत्-तत्त्व के रूप में मुक्त की जाती है, जिसमें भगवान् अपने प्रथम पुरुषावतार, अर्थात् महाविष्णु के रूप में, प्रवेश करते हैं। वे कारणार्णव में शयन करते हैं और असंख्य ब्रह्माण्डों को निःश्वसित करते हैं, और प्रत्येक ब्रह्माण्ड में भगवान् पुनः गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में प्रवेश करते हैं। प्रत्येक ब्रह्माण्ड इसी प्रकार सृजित होता है। वे आगे और भी क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में अपना प्रकटीकरण करते हैं, और वे विष्णु प्रत्येक वस्तु में—यहाँ तक कि सूक्ष्म परमाणु में भी—प्रवेश करते हैं। यह तथ्य यहाँ समझाया गया है। वे प्रत्येक वस्तु में प्रवेश करते हैं।

अब, जहाँ तक जीवों का सम्बन्ध है, वे इस भौतिक प्रकृति में आरोपित होते हैं, और अपने पूर्व कर्मों के फलस्वरूप वे विभिन्न स्थितियाँ ग्रहण करते हैं। इस प्रकार इस भौतिक जगत् की क्रियाएँ आरम्भ होती हैं। जीवों की विभिन्न योनियों की क्रियाएँ सृष्टि के प्रथम क्षण से ही आरम्भ हो जाती हैं। ऐसा नहीं है कि सब कुछ क्रमविकास से बनता है। विभिन्न जीव-योनियाँ ब्रह्माण्ड के साथ ही तुरन्त सृजित हो जाती हैं। मनुष्य, पशु, जन्तु, पक्षी—सब कुछ साथ-साथ सृजित होता है, क्योंकि पिछले प्रलय के समय जीवों की जो भी इच्छाएँ थीं, वे पुनः प्रकट हो जाती हैं। यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जीवों का इस प्रक्रिया से कोई सरोकार नहीं है। पूर्व सृष्टि में, अपने पिछले जीवन में जो उनकी अवस्था थी, वह बस पुनः प्रकट हो जाती है, और यह सब केवल उनकी इच्छा से होता है। यही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की अचिन्त्य सामर्थ्य है। और विभिन्न जीव-योनियों का सृजन करने के पश्चात् उनका उनसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता। सृष्टि विभिन्न जीवों की प्रवृत्तियों को समायोजित करने हेतु होती है, अतः भगवान् इसमें संलिप्त नहीं होते।