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अध्याय 1 · 11 / 39

1.11

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागवमस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥

अयनेषु—मोर्चों पर; च—भी; सर्वेषु—सर्वत्र; यथाभागम्—जैसे-जैसे भिन्न-भिन्न व्यवस्थित हैं; अवस्थिताः—स्थित; भीष्मम्—पितामह भीष्म को; एव—निश्चय ही; अभिरक्षन्तु—सहायता प्रदान की जाए; भवन्तः—आप सब; सर्वे—यथायोग्य; एव—निश्चय ही; हि—और ठीक-ठीक।

अब आप सब सेना के व्यूह में अपने-अपने मोर्चों पर स्थित होकर पितामह भीष्म को पूर्ण सहायता प्रदान करें।

भीष्म के पराक्रम की प्रशंसा करने के पश्चात् दुर्योधन ने आगे यह विचार किया कि अन्य लोग ऐसा सोच सकते हैं कि उन्हें कम महत्त्वपूर्ण समझा गया है, अतः अपनी सामान्य कूटनीतिक रीति से उसने उपर्युक्त शब्दों में स्थिति को सँभालने का प्रयत्न किया। उसने बल देकर कहा कि भीष्मदेव निस्सन्देह सबसे महान् वीर थे, किन्तु वे वृद्ध थे, अतः प्रत्येक व्यक्ति को विशेष रूप से सब ओर से उनकी रक्षा का ध्यान रखना चाहिए। वे युद्ध में संलग्न हो सकते थे, और शत्रु एक ओर उनकी पूर्ण व्यस्तता का लाभ उठा सकता था। अतः यह आवश्यक था कि अन्य वीर अपने मोर्चों को न छोड़ें और शत्रु को व्यूह तोड़ने का अवसर न दें। दुर्योधन स्पष्ट रूप से अनुभव करता था कि कुरुओं की विजय भीष्मदेव की उपस्थिति पर निर्भर थी। उसे युद्ध में भीष्मदेव तथा द्रोणाचार्य के पूर्ण सहयोग का विश्वास था, क्योंकि वह भली-भाँति जानता था कि जब अर्जुन की पत्नी द्रौपदी ने, अपनी असहाय अवस्था में, सभा में समस्त महान् सेनापतियों के समक्ष विवस्त्र किए जाने पर न्याय हेतु उनसे प्रार्थना की थी, तब उन्होंने एक शब्द तक नहीं कहा था। यद्यपि वह जानता था कि उन दोनों सेनापतियों का पाण्डवों के प्रति किसी प्रकार का स्नेह था, तथापि उसे आशा थी कि अब वे ऐसा समस्त स्नेह पूर्णतः त्याग देंगे, जैसा द्यूत-क्रीड़ा के समय प्रथा थी।