अध्याय 1 · 12 / 39
1.12
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥
तस्य—उसकी; सञ्जनयन्—बढ़ाते हुए; हर्षम्—प्रसन्नता; कुरु-वृद्धः—कुरुवंश के पितामह (भीष्म); पितामहः—पितामह; सिंह-नादम्—सिंह के समान गर्जना; विनद्य—गुंजायमान करते हुए; उच्चैः—अत्यन्त उच्च स्वर से; शङ्खम्—शंख; दध्मौ—बजाया; प्रतापवान्—वीर।
तब कुरुवंश के महान् वीर पितामह भीष्म ने, जो योद्धाओं के पितामह थे, सिंह की गर्जना के समान अत्यन्त उच्च स्वर से अपना शंख बजाया, जिससे दुर्योधन को हर्ष हुआ।
कुरुवंश के पितामह अपने पौत्र दुर्योधन के हृदय का आन्तरिक अभिप्राय समझ सकते थे, और उसके प्रति अपनी स्वाभाविक करुणा के कारण उन्होंने अपने सिंह-तुल्य पद के अनुरूप अत्यन्त उच्च स्वर से शंख बजाकर उसे प्रसन्न करने का प्रयत्न किया। परोक्ष रूप से, शंख के प्रतीक द्वारा, उन्होंने अपने निराश पौत्र दुर्योधन को सूचित कर दिया कि युद्ध में उसकी विजय की कोई सम्भावना नहीं थी, क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण दूसरे पक्ष में थे। किन्तु फिर भी, युद्ध का संचालन करना उनका कर्तव्य था, और उस सम्बन्ध में किसी प्रकार के परिश्रम में कमी नहीं की जाएगी।