अध्याय 1 · 16 / 39
1.16-18
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ १७ ॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥ १८ ॥
ananta-vijayam—अनन्तविजय नामक शंख; rājā—राजा; kuntī-putraḥ—कुन्तीपुत्र; yudhiṣṭhiraḥ—युधिष्ठिर; nakulaḥ—नकुल; sahadevaḥ—सहदेव; ca—तथा; sughoṣa-maṇipuṣpakau—सुघोष तथा मणिपुष्पक नामक शंख; kāśyaḥ—काशी (वाराणसी) के राजा; ca—तथा; parama-iṣu-āsaḥ—महान् धनुर्धर; śikhaṇḍī—शिखण्डी; ca—भी; mahā-rathaḥ—जो अकेला सहस्रों के विरुद्ध लड़ सके; dhṛṣṭadyumnaḥ—धृष्टद्युम्न (राजा द्रुपद का पुत्र); virāṭaḥ—विराट (वह राजकुमार जिसने छद्मवेश में रहते हुए पाण्डवों को आश्रय दिया); ca—भी; sātyakiḥ—सात्यकि (युयुधान, भगवान् श्रीकृष्ण का सारथि); ca—तथा; aparājitaḥ—जो कभी पराजित नहीं हुआ; drupadaḥ—द्रुपद, पाञ्चाल के राजा; draupadeyāḥ—द्रौपदी के पुत्र; ca—भी; sarvaśaḥ—सब; pṛthivī-pate—हे राजन्; saubhadraḥ—अभिमन्यु, सुभद्रा का पुत्र; ca—भी; mahā-bāhuḥ—महाबाहु; śaṅkhān—शंख; dadhmuḥ—बजाए; pṛthak pṛthak—पृथक्-पृथक्।
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपना अनन्तविजय नामक शंख बजाया, और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष तथा मणिपुष्पक बजाए। हे राजन्, उस महान् धनुर्धर काशिराज ने, महान् योद्धा शिखण्डी ने, धृष्टद्युम्न, विराट तथा अपराजित सात्यकि ने, द्रुपद ने, द्रौपदी के पुत्रों ने, तथा अन्यों ने—जैसे महाबाहु सुभद्रापुत्र अभिमन्यु ने—सभी ने अपने-अपने शंख बजाए।
सञ्जय ने राजा धृतराष्ट्र को अत्यन्त कुशलतापूर्वक सूचित किया कि पाण्डुपुत्रों को छलने तथा अपने ही पुत्रों को राज्य के सिंहासन पर बैठाने की उनकी अविवेकपूर्ण नीति अधिक प्रशंसनीय नहीं थी। चिह्न पहले ही स्पष्ट रूप से संकेत कर चुके थे कि उस महान् संग्राम में समस्त कुरुवंश का संहार हो जाएगा। पितामह भीष्म से आरम्भ कर अभिमन्यु जैसे पौत्रों तक—संसार के अनेक राज्यों के राजाओं सहित—सभी वहाँ उपस्थित थे, और सभी विनाश को प्राप्त होने वाले थे। यह समूचा प्रलय राजा धृतराष्ट्र के कारण था, क्योंकि उन्होंने अपने पुत्रों द्वारा अपनाई गई नीति को प्रोत्साहन दिया।