हि

अध्याय 1 · 17 / 39

1.19

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् ॥ १९ ॥

saḥ—वह; ghoṣaḥ—ध्वनि; dhārtarāṣṭrāṇām—धृतराष्ट्र के पुत्रों के; hṛdayāni—हृदय; vyadārayat—विदीर्ण कर दिए; nabhaḥ—आकाश; ca—भी; pṛthivīm—पृथ्वी का तल; ca—भी; eva—निश्चय ही; tumulaḥ—प्रचण्ड; abhyanunādayan—प्रतिध्वनित होकर।

इन भिन्न-भिन्न शंखों का बजना प्रचण्ड हो उठा, और इस प्रकार आकाश तथा पृथ्वी दोनों में गूँजते हुए उसने धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय विदीर्ण कर दिए।

जब भीष्म तथा दुर्योधन के पक्ष के अन्य व्यक्तियों ने अपने-अपने शंख बजाए, तब पाण्डवों की ओर हृदय-विदारण नहीं हुआ। ऐसी घटनाओं का उल्लेख नहीं है, किन्तु इस विशिष्ट श्लोक में उल्लेख है कि पाण्डव-पक्ष द्वारा प्रतिध्वनित ध्वनियों से धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय विदीर्ण हो गए। यह पाण्डवों तथा भगवान् श्रीकृष्ण में उनकी श्रद्धा के कारण है। जो परमेश्वर की शरण लेता है, उसे सबसे बड़े संकट के मध्य भी किसी से भय नहीं रहता।