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अध्याय 1 · 18 / 39

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अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ॥ २० ॥

atha—तदनन्तर; vyavasthitān—स्थित; dṛṣṭvā—देखकर; dhārtarāṣṭrān—धृतराष्ट्र के पुत्रों को; kapi-dhvajaḥ—जिसकी ध्वजा पर हनुमान् अंकित हैं; pravṛtte—जब प्रवृत्त होने को था; śastra-sampāte—बाण-संधान; dhanuḥ—धनुष; udyamya—उठाकर; pāṇḍavaḥ—पाण्डुपुत्र (अर्जुन); hṛṣīkeśam—भगवान् श्रीकृष्ण से; tadā—उस समय; vākyam—वचन; idam—ये; āha—कहे; mahī-pate—हे राजन्।

हे राजन्, उस समय अपने रथ पर विराजमान, हनुमान्-चिह्नित ध्वजावाले पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना धनुष उठाया और धृतराष्ट्र के पुत्रों को देखते हुए अपने बाण चलाने को उद्यत हुआ। हे राजन्, तब अर्जुन ने हृषीकेश [श्रीकृष्ण] से ये वचन कहे:

युद्ध आरम्भ ही होने को था। उपर्युक्त कथन से यह समझ में आता है कि धृतराष्ट्र के पुत्र पाण्डवों द्वारा सेना की अप्रत्याशित व्यूह-रचना से कुछ हद तक निरुत्साहित हो गए थे; पाण्डव युद्धभूमि पर भगवान् श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष निर्देशों से निर्देशित थे। अर्जुन की ध्वजा पर हनुमान् का चिह्न विजय का एक और संकेत है, क्योंकि राम तथा रावण के युद्ध में हनुमान् ने भगवान् राम का सहयोग किया था, और भगवान् राम विजयी हुए थे। अब राम तथा हनुमान् दोनों अर्जुन की सहायता हेतु उसके रथ पर उपस्थित थे। भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं राम हैं, और जहाँ भगवान् राम हैं, वहाँ उनके नित्य सेवक हनुमान् तथा उनकी नित्य संगिनी लक्ष्मीरूपा सीता उपस्थित रहती हैं। अतः अर्जुन को किसी भी शत्रु से भयभीत होने का कोई कारण नहीं था। और सबसे बढ़कर, इन्द्रियों के स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण उसे मार्गदर्शन देने हेतु स्वयं उपस्थित थे। इस प्रकार युद्ध-सञ्चालन के विषय में अर्जुन को समस्त सत्परामर्श उपलब्ध था। भगवान् द्वारा अपने नित्य भक्त के लिए सँजोई गई ऐसी मंगलमय परिस्थितियों में सुनिश्चित विजय के चिह्न निहित थे।