हि

अध्याय 1 · 19 / 39

1.21-22

अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ॥ २१ ॥
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥

arjunaḥ—अर्जुन; uvāca—ने कहा; senayoḥ—सेनाओं के; ubhayoḥ—दोनों पक्षों के; madhye—मध्य में; ratham—रथ; sthāpaya—कृपया खड़ा कीजिए; me—मेरा; acyuta—हे अच्युत; yāvat—जब तक; etān—इन सबको; nirīkṣe—देख लूँ; aham—मैं; yoddhu-kāmān—युद्ध की इच्छा रखनेवाले; avasthitān—युद्धभूमि पर पंक्तिबद्ध; kaiḥ—किनके साथ; mayā—मुझे; saha—साथ; yoddhavyam—युद्ध करना है; asmin—इस; raṇa—संग्राम; samudyame—प्रयास में।

अर्जुन ने कहा: हे अच्युत, कृपया मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा कीजिए, जिससे मैं देख सकूँ कि यहाँ कौन-कौन उपस्थित हैं, कौन युद्ध के इच्छुक हैं, और इस महान् संग्राम-प्रयास में मुझे किनके साथ युद्ध करना है।

यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, तथापि अपनी अहैतुकी कृपा से वे अपने मित्र की सेवा में संलग्न थे। वे अपने भक्तों के प्रति अपने स्नेह में कभी नहीं डिगते, और इसी कारण यहाँ उन्हें अच्युत कहकर सम्बोधित किया गया है। सारथि के रूप में उन्हें अर्जुन के आदेशों का पालन करना था, और चूँकि उन्होंने ऐसा करने में तनिक भी संकोच नहीं किया, इसलिए उन्हें अच्युत कहकर सम्बोधित किया गया है। यद्यपि उन्होंने अपने भक्त के लिए सारथि का पद स्वीकार किया था, तथापि उनके परम पद को कोई चुनौती नहीं मिली। समस्त परिस्थितियों में वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, हृषीकेश, समस्त इन्द्रियों के स्वामी हैं। भगवान् तथा उनके सेवक का सम्बन्ध अत्यन्त मधुर तथा दिव्य है। सेवक सदा भगवान् की सेवा करने को तत्पर रहता है, और इसी प्रकार भगवान् भी सदा भक्त की कोई सेवा करने का अवसर ढूँढ़ते रहते हैं। वे अपने शुद्ध भक्त को आदेश देनेवाले के उत्तम पद ग्रहण करते देखकर उतना ही अधिक आनन्द पाते हैं, जितना आदेश-दाता होने में नहीं। स्वामी के रूप में सब उनके आदेश के अधीन हैं, और कोई उनसे ऊपर नहीं जो उन्हें आदेश दे सके। किन्तु जब वे देखते हैं कि कोई शुद्ध भक्त उन्हें आदेश दे रहा है, तब वे दिव्य आनन्द प्राप्त करते हैं, यद्यपि वे समस्त परिस्थितियों के अच्युत स्वामी हैं।

भगवान् के एक शुद्ध भक्त के रूप में अर्जुन को अपने चचेरे भाइयों तथा बन्धुओं से युद्ध करने की कोई इच्छा नहीं थी, किन्तु दुर्योधन की हठधर्मिता ने उसे युद्धभूमि में आने को विवश कर दिया, जो किसी भी शान्तिपूर्ण समझौते के लिए कभी सहमत नहीं हुआ। अतः वह यह देखने को अत्यन्त उत्सुक था कि युद्धभूमि पर उपस्थित प्रमुख व्यक्ति कौन-कौन थे। यद्यपि युद्धभूमि पर शान्ति-स्थापना के प्रयास का कोई प्रश्न ही नहीं था, तथापि वह उन्हें पुनः देखना चाहता था, और यह भी देखना चाहता था कि वे एक अवांछित युद्ध की माँग पर कितने अड़े हुए थे।