हि

अध्याय 1 · 20 / 39

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योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥

yotsyamānān—जो युद्ध करेंगे; avekṣe—मुझे देख लेने दीजिए; aham—मैं; ye—जो; ete—वे; atra—यहाँ; samāgatāḥ—एकत्र; dhārtarāṣṭrasya—धृतराष्ट्र के पुत्र के; durbuddheḥ—दुर्बुद्धि; yuddhe—युद्ध में; priya—प्रिय; cikīrṣavaḥ—करना चाहनेवाले।

मुझे उन्हें देख लेने दीजिए जो यहाँ युद्ध करने आए हैं, और जो धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि पुत्र का प्रिय करना चाहते हैं।

यह एक खुला रहस्य था कि दुर्योधन अपने पिता धृतराष्ट्र के सहयोग से कुटिल योजनाओं द्वारा पाण्डवों के राज्य को हड़पना चाहता था। अतः जो भी व्यक्ति दुर्योधन के पक्ष में सम्मिलित हुए थे, वे अवश्य ही एक ही प्रकृति के रहे होंगे। अर्जुन युद्ध आरम्भ होने से पूर्व उन्हें युद्धभूमि में देखना चाहता था, केवल यह जानने के लिए कि वे कौन थे, किन्तु उनके साथ शान्ति-वार्ता का प्रस्ताव रखने का उसका कोई अभिप्राय नहीं था। यह भी तथ्य था कि वह उन्हें देखकर उस बल का अनुमान लगाना चाहता था जिसका उसे सामना करना था, यद्यपि वह विजय के प्रति पूर्णतः आश्वस्त था क्योंकि श्रीकृष्ण उसके पार्श्व में विराजमान थे।