अध्याय 1 · 21 / 39
1.24
सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥
sañjayaḥ—सञ्जय; uvāca—ने कहा; evam—इस प्रकार; uktaḥ—सम्बोधित किए जाने पर; hṛṣīkeśaḥ—भगवान् श्रीकृष्ण; guḍākeśena—अर्जुन द्वारा; bhārata—हे भरतवंशी; senayoḥ—सेनाओं के; ubhayoḥ—दोनों के; madhye—मध्य में; sthāpayitvā—खड़ा करके; rathottamam—उत्तम रथ।
सञ्जय ने कहा: हे भरतवंशी, अर्जुन द्वारा इस प्रकार सम्बोधित किए जाने पर भगवान् श्रीकृष्ण ने उस उत्तम रथ को दोनों पक्षों की सेनाओं के मध्य खड़ा कर दिया।
इस श्लोक में अर्जुन को गुडाकेश कहा गया है। गुडाका का अर्थ है निद्रा, और जो निद्रा को जीत लेता है, उसे गुडाकेश कहते हैं। निद्रा का अर्थ अज्ञान भी है। अतः अर्जुन ने श्रीकृष्ण के साथ अपनी मित्रता के कारण निद्रा तथा अज्ञान दोनों को जीत लिया। श्रीकृष्ण के एक महान् भक्त के रूप में वह क्षण भर के लिए भी श्रीकृष्ण को विस्मृत नहीं कर सकता था, क्योंकि भक्त का यही स्वभाव होता है। जाग्रत अवस्था में हो या निद्रा में, भगवान् का भक्त श्रीकृष्ण के नाम, रूप, गुण तथा लीला का चिन्तन किए बिना कभी नहीं रह सकता। इस प्रकार श्रीकृष्ण का भक्त केवल श्रीकृष्ण का निरन्तर चिन्तन करके ही निद्रा तथा अज्ञान दोनों को जीत सकता है। इसे ही कृष्णभावनामृत अथवा समाधि कहते हैं। हृषीकेश के रूप में, अर्थात् प्रत्येक जीव की इन्द्रियों तथा मन के संचालक के रूप में, श्रीकृष्ण रथ को सेनाओं के मध्य खड़ा करने में अर्जुन के प्रयोजन को समझ सकते थे। अतः उन्होंने वैसा ही किया, और इस प्रकार बोले।