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अध्याय 1 · 22 / 39

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भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरुनिति ॥ २५ ॥

bhīṣma—पितामह भीष्म; droṇa—आचार्य द्रोण; pramukhataḥ—के समक्ष; sarveṣām—समस्त; ca—भी; mahī-kṣitām—संसार के अधिपतियों के; uvāca—कहा; pārtha—हे पार्थ (पृथा के पुत्र); paśya—देखो; etān—इन सबको; samavetān—एकत्रित; kurūn—समस्त कुरुवंशियों को; iti—इस प्रकार।

भीष्म, द्रोण तथा संसार के अन्य समस्त अधिपतियों के समक्ष, भगवान् हृषीकेश ने कहा: हे पार्थ, यहाँ एकत्रित इन समस्त कुरुओं को देखो।

समस्त जीवों के परमात्मा के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के मन में जो चल रहा था, उसे समझ सकते थे। इस सन्दर्भ में हृषीकेश शब्द का प्रयोग यह इंगित करता है कि वे सब कुछ जानते थे। और पार्थ, अर्थात् कुन्ती अथवा पृथा के पुत्र, शब्द भी अर्जुन के सन्दर्भ में इसी प्रकार सार्थक है। एक मित्र के रूप में वे अर्जुन को सूचित करना चाहते थे कि चूँकि अर्जुन उनके अपने पिता वसुदेव की बहन पृथा का पुत्र था, इसलिए उन्होंने अर्जुन का सारथि बनना स्वीकार किया था। अब श्रीकृष्ण का क्या अभिप्राय था जब उन्होंने अर्जुन से कहा कि “कुरुओं को देखो”? क्या अर्जुन वहीं रुक जाना चाहता था और युद्ध नहीं करना चाहता था? श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ पृथा के पुत्र से ऐसी अपेक्षा कभी नहीं की। इस प्रकार भगवान् ने मैत्रीपूर्ण विनोद में अर्जुन के मन का पूर्वानुमान लगाया।