हि

अध्याय 1 · 23 / 39

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तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ॥ २६ ॥

tatra—वहाँ; apaśyat—वह देख सका; sthitān—खड़े; pārthaḥ—अर्जुन; pitṝn—पिताओं को; atha—भी; pitāmahān—पितामहों को; ācāryān—आचार्यों को; mātulān—मामाओं को; bhrātṝn—भाइयों को; putrān—पुत्रों को; pautrān—पौत्रों को; sakhīn—मित्रों को; tathā—भी; śvaśurān—श्वसुरों को; suhṛdaḥ—शुभचिन्तकों को; ca—भी; eva—निश्चय ही; senayoḥ—सेनाओं के; ubhayoḥ—दोनों पक्षों के; api—सहित।

वहाँ अर्जुन दोनों पक्षों की सेनाओं के मध्य अपने पिताओं, पितामहों, आचार्यों, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, तथा अपने श्वसुर और शुभचिन्तकों को भी देख सका—जो सभी वहाँ उपस्थित थे।

युद्धभूमि पर अर्जुन सब प्रकार के सम्बन्धियों को देख सका। वह भूरिश्रवा जैसे व्यक्तियों को देख सका जो उसके पिता के समकालीन थे, भीष्म तथा सोमदत्त जैसे पितामहों को, द्रोणाचार्य तथा कृपाचार्य जैसे आचार्यों को, शल्य तथा शकुनि जैसे मामाओं को, दुर्योधन जैसे भाइयों को, लक्ष्मण जैसे पुत्रों को, अश्वत्थामा जैसे मित्रों को, कृतवर्मा जैसे शुभचिन्तकों को, इत्यादि। वह उन सेनाओं को भी देख सका जिनमें उसके अनेक मित्र सम्मिलित थे।