अध्याय 1 · 24 / 39
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तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ॥ २७ ॥
tān—उन सबको; samīkṣya—देखकर; saḥ—वह; kaunteyaḥ—कुन्तीपुत्र; sarvān—सब प्रकार के; bandhūn—सम्बन्धियों को; avasthitān—स्थित; kṛpayā—करुणा से; parayā—उच्च कोटि की; āviṣṭaḥ—अभिभूत; viṣīdan—शोक करते हुए; idam—इस प्रकार; abravīt—बोला।
जब कुन्तीपुत्र अर्जुन ने इन विभिन्न श्रेणियों के मित्रों तथा सम्बन्धियों को देखा, तब वह करुणा से अभिभूत हो उठा और इस प्रकार बोला: