अध्याय 1 · 25 / 39
1.28
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥ २८ ॥
arjunaḥ—अर्जुन; uvāca—ने कहा; dṛṣṭvā—देखकर; imam—इन सबको; sva-janam—स्वजनों को; kṛṣṇa—हे कृष्ण; yuyutsum—युद्ध की भावना से युक्त; samupasthitam—सब उपस्थित; sīdanti—काँप रहे हैं; mama—मेरे; gātrāṇi—शरीर के अंग; mukham—मुख; ca—भी; pariśuṣyati—सूख रहा है।
अर्जुन ने कहा: हे प्रिय कृष्ण, अपने सम्मुख इस प्रकार युद्ध की भावना से युक्त अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों को उपस्थित देखकर, मैं अपने शरीर के अंगों को काँपते तथा अपने मुख को सूखते हुए अनुभव कर रहा हूँ।
जिस किसी मनुष्य में भगवान् के प्रति यथार्थ भक्ति होती है, उसमें वे समस्त सद्गुण विद्यमान रहते हैं जो दैवी व्यक्तियों अथवा देवताओं में पाए जाते हैं; जबकि अभक्त, चाहे वह शिक्षा तथा संस्कृति द्वारा भौतिक योग्यताओं में कितना ही उन्नत क्यों न हो, दैवी गुणों से रहित होता है। अतएव अर्जुन, युद्धभूमि पर अपने स्वजनों, मित्रों तथा सम्बन्धियों को देखते ही, उनके प्रति करुणा से तत्क्षण अभिभूत हो उठा, जिन्होंने परस्पर युद्ध करने का ऐसा निश्चय किया था। जहाँ तक उसके अपने सैनिकों का प्रश्न था, वह आरम्भ से ही उनके प्रति सहृदय था; किन्तु विपक्ष के सैनिकों की आसन्न मृत्यु की कल्पना कर उसने उनके प्रति भी करुणा अनुभव की। और ऐसा सोचते हुए उसके शरीर के अंग काँपने लगे, और उसका मुख सूख गया। उनकी युद्ध की भावना देखकर वह कुछ हद तक विस्मित था। प्रायः समूचा कुल, अर्जुन के समस्त रक्त-सम्बन्धी, उससे युद्ध करने आ गए थे। इसने अर्जुन जैसे करुणामय भक्त को अभिभूत कर दिया। यद्यपि यहाँ इसका उल्लेख नहीं है, तथापि सहज ही कल्पना की जा सकती है कि अर्जुन के न केवल शरीर के अंग काँप रहे थे और उसका मुख सूख रहा था, अपितु वह करुणावश रो भी रहा था। अर्जुन में ऐसे लक्षण दुर्बलता के कारण नहीं, अपितु उसकी कोमलहृदयता के कारण थे, जो भगवान् के एक शुद्ध भक्त का विशेष लक्षण है। इसीलिए कहा गया है:
yasyāsti bhaktir bhagavaty akiñcanā
sarvair guṇais tatra samāsate surāḥ
harāv abhaktasya kuto mahad-guṇā
mano-rathenāsati dhāvato bahiḥ
“जिसकी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति अविचल भक्ति है, उसमें देवताओं के समस्त सद्गुण विद्यमान रहते हैं। किन्तु जो भगवान् का भक्त नहीं है, उसमें केवल वे भौतिक योग्यताएँ होती हैं जिनका अल्प मूल्य है। इसका कारण यह है कि वह मानसिक धरातल पर मँडराता रहता है, और निश्चय ही चकाचौंध करनेवाली भौतिक ऊर्जा द्वारा आकृष्ट हो जाता है।” (भा. 5.18.12)