अध्याय 1 · 27 / 39
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न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ॥ ३० ॥
na—न तो; ca—भी; śaknomi—मैं समर्थ हूँ; avasthātum—ठहरने में; bhramati—भूलते हुए; iva—जैसे; ca—और; me—मेरा; manaḥ—मन; nimittāni—कारण; ca—भी; paśyāmi—मैं देखता हूँ; viparītāni—ठीक विपरीत; keśava—हे केशी असुर के संहारक (श्रीकृष्ण)।
अब मैं यहाँ और अधिक खड़े रहने में असमर्थ हूँ। मैं स्वयं को भूल रहा हूँ और मेरा मन चकरा रहा है। हे केशी असुर के संहारक, मुझे केवल अमंगल ही दिखाई दे रहा है।
अपनी अधीरता के कारण अर्जुन युद्धभूमि में ठहरने में असमर्थ था, और मन की दुर्बलता के कारण वह स्वयं को भूल रहा था। भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति मनुष्य को अस्तित्व की एक भ्रामक अवस्था में डाल देती है। भयं द्वितीयाभिनिवेशतः—ऐसा भय तथा मानसिक सन्तुलन का लोप उन व्यक्तियों में होता है जो भौतिक अवस्था से अत्यधिक प्रभावित होते हैं। अर्जुन को युद्धभूमि में केवल दुःख ही दिखाई दे रहा था—शत्रु पर विजय पाकर भी उसे सुख न मिलता। निमित्त शब्द सार्थक है। जब मनुष्य अपनी आकांक्षाओं में केवल निराशा देखता है, तब वह सोचता है, “मैं यहाँ क्यों हूँ?” प्रत्येक व्यक्ति अपने में तथा अपने कल्याण में रुचि रखता है। कोई परम आत्मा में रुचि नहीं रखता। अर्जुन से अपेक्षित है कि वह श्रीकृष्ण की इच्छा के प्रति समर्पण द्वारा स्वार्थ की उपेक्षा प्रकट करे, जो सबके वास्तविक स्वार्थ हैं। बद्ध जीव इसे भूल जाता है, अतएव भौतिक कष्ट भोगता है। अर्जुन ने सोचा कि युद्ध में उसकी विजय उसके लिए केवल शोक का कारण होगी।