हि

अध्याय 1 · 28 / 39

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न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ।
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ॥ ३१ ॥

na—न तो; ca—भी; śreyaḥ—कल्याण; anupaśyāmi—मैं देखता हूँ; hatvā—मारकर; svajanam—अपने स्वजन; āhave—युद्ध में; na—न तो; kānkṣe—मैं इच्छा करता हूँ; vijayam—विजय; kṛṣṇa—हे श्रीकृष्ण; na—न तो; ca—भी; rājyam—राज्य; sukhāni—उससे प्राप्त सुख; ca—भी।

मुझे नहीं दिखता कि इस युद्ध में अपने ही स्वजनों का वध करने से कोई कल्याण हो सकता है, और न ही, हे प्रिय श्रीकृष्ण, मैं तत्पश्चात् किसी विजय, राज्य अथवा सुख की इच्छा करता हूँ।

यह जाने बिना कि मनुष्य का स्वार्थ विष्णु (अथवा श्रीकृष्ण) में निहित है, बद्ध जीव देहसम्बन्धों की ओर आकृष्ट होते हैं, ऐसी अवस्थाओं में सुखी होने की आशा करते हुए। भ्रमवश वे भूल जाते हैं कि श्रीकृष्ण भौतिक सुख के भी कारण हैं। प्रतीत होता है कि अर्जुन क्षत्रिय के नैतिक नियमों को भी भूल चुका था। कहा जाता है कि दो प्रकार के पुरुष, अर्थात् वह क्षत्रिय जो श्रीकृष्ण के साक्षात् आदेश से युद्धभूमि में सम्मुख होकर प्राण त्यागता है, तथा वह संन्यासी जो पूर्णतया आध्यात्मिक संस्कृति में समर्पित है, उस सूर्यलोक में प्रवेश के योग्य होते हैं, जो इतना शक्तिशाली एवं देदीप्यमान है। अर्जुन तो अपने शत्रुओं तक का वध करने में अनिच्छुक है, फिर अपने सम्बन्धियों की तो बात ही क्या। उसने सोचा कि अपने स्वजनों का वध करने से उसके जीवन में कोई सुख न होगा, अतएव वह युद्ध करने को तैयार नहीं था, ठीक जैसे जिस व्यक्ति को भूख न लगी हो वह भोजन पकाने को प्रवृत्त नहीं होता। उसने अब निर्णय कर लिया कि वह वन में जाकर निराशा में एकान्त जीवन व्यतीत करेगा। किन्तु क्षत्रिय होने के कारण उसे अपनी जीविका के लिए राज्य की आवश्यकता है, क्योंकि क्षत्रिय किसी अन्य वृत्ति में संलग्न नहीं हो सकते। परन्तु अर्जुन के पास कोई राज्य नहीं था। अर्जुन के लिए राज्य प्राप्त करने का एकमात्र अवसर अपने चचेरे भाइयों तथा भाइयों से युद्ध करने और अपने पिता से प्राप्त राज्य को पुनः अधिकार में लेने में था, जो वह करना नहीं चाहता। अतएव वह स्वयं को वन में जाकर निराशा का एकान्त जीवन बिताने योग्य समझता है।